Thursday, August 10, 2006

अथ श्री लंगोट कथा

अभी पटना वाले पोरफेसर साहेब मटुकनाथ बाबू की रास चरचा से हम निपटबो नहीं किए थे कि गवैया उदित बाबू पटना में दू ठो मेहरारू के बीच सैंडबिच बन गए। हमरे मित्र सब कहते हैं कि दोनों मामला ढीली लंगोटी का है। मतलब ढीले करेक्टर का है। एक की लंगोटी शिष्या के कारण ढीली हुई या ई कहिए कि शिष्या ने ढीली कर दी, तो दूसरे की एक ठो बिमान बाला ने। अब हम कन्फूजन में हूं कि इन सूरमाओं को हम ढीली लंगोटी वाला मानूं या कि मजबूत लंगोटी वाला। का है कि ऐसन पंगा दोए आदमी ले सकता है- एक तो उ, जिसकी लंगोटी एतना टाइट हो कि दुनिया लाख कोशिश कर ले, लेकिन खिसका नहीं पाए औरो दूसरा उ, जिसको लंगोटी खिसकने का डरे नहीं हो।

खैर, हम कन्फूजन दूर करने पहुंचे पोरफेसर साहेब के पास। छिड़ गई लंगोट चरचा। कहने लगे, 'काहे का लंगोट। हमको का नटवर बाबू समझते हैं कि गलत कामो करेंगे औरो लंगोट की भी चिंता करेंगे! हम तो उसको उसी दिन धारण करना छोड़ दिए, जिस दिन अपना दिल बीवी से हटकर जूली पर आ गया। वैसे, जहां तक कमजोर लंगोटी की बात है, तो ई तो उन पोरफेसरों का है, जो क्लास से लेकर पीएचडी तक में शिष्याओं को टॉप कराते रहते हैं औरो दुनिया को पते नहीं चलता। आपको का लगता है, ई 'परोपकार' मुफ्त में होता है। अरे, उ कमजोर लंगोटी के हैं, तब न कंबल ओढ़कर घी पीते हैं। इससे तो बेसी बढ़िया है कि हमरे जैसे लंगोट उतार के चलो, खिसकने का कोयो खतरे नहीं बचेगा!'

पोरफेसर साहेब ऐसे तन जाएंगे, इसका अंदाजा हमको नहीं था। का है कि लंगोट खिंचाई में पतरकार से कोयो जीत जाए, ऐसा होता नहीं है, लेकिन उनकी मजबूत लंगोट ने हमरी हालत पस्त कर दी। एतना पस्त कि हम गवैया बाबू की लंगोटी का हाल जानने लायक भी नहीं बचे। बचते-बचते हम रोड पर पहुंचे, तो पहलवानी लंगोट पहने नटवर बाबू देह को तेल पिला रहे थे। उनकी लंगोट देख हमने सोचा कि कुछ चरचा इन्हीं से कर लूं, लेकिन उ अपने ही धुन में थे। ताल ठोंकते बोले- किसकी लंगोट कमजोर है, ई तो हमको नहीं पता, लेकिन जिस कांगेस ने हमको इस लंगोट में रोड पर खड़ा किया है, उसकी लंगोट हम जरूर ढीली कर देंगे। हम मटुकनाथ थोड़े ही हैं कि लोग हमरे मुंह में कालिख पोत दे औरो हम कुछ नहीं कहें।

शूरवीरता वाला उनका बयान सुनकर हमको अपने जस्सो बाबू याद आ गए। का है कि उन्होंने भी किताब छापकर अपनी लंगोट मजबूत दिखाई थी, लेकिन अमेरिकी जासूस की बात पर सरदार जी ऐसन खंभ ठोककर खड़े हो गए कि दूए दिन में जस्सो बाबू की लंगोट खिसकने लगी। उ तो भला हो पाठक जी की रिपोर्ट और उसको लीक करने वालों की कि ऐन मौका पर जस्सो बाबू की लंगोट पर कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ गई, नहीं तो दूसरे मटुकनाथ तो वही होने वाले थे।

खैर, अब बारी इस लंगोट कथा के निष्कर्ष की। हमरे खयाल से अक्सर जो जेतना मजबूत लंगोट के दिखता है, ओतना होता नहीं। इसलिए अगली बार जब आपको कोयो अपनी मजबूत लंगोट दिखा के डराए, तो डरने से पहले एक बार उसको खींचने की कोशिश जरूर कीजिएगा। का पता, उनकी हालत भी जस्सो बाबू औरो नटवर बाबू जैसी हो!

1 comment:

Udan Tashtari said...

सटीक लिखते हो,भाई...लिखते रहो.