Thursday, October 12, 2006

मच्छर ने किसको बनाया हिजड़ा

देश में आजकल दू तरह के जीवों का आतंक कायम है- एक तो आतंकवादी, दूसरा मच्छर। दोनों के आतंक से देश की हालत खराब है। हमको तो लगता है कि दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। आप चाहें तो मच्छर को आतंकवादी कह दीजिए औरो आतंकवादी को मच्छर, काहे कि दोनों को मनमानी की पूरी छूट है औरो दोनों कहीं भी पहुंच सकते हैं- पुरानी दिल्ली की गलियों से लेकर परधान मंतरी निवास औरो संसद तक। औरो फिर दोनों किसी पर भी अटेक कर सकता है। जिस तरह डेंगू अपने घासीराम को हुआ, तो परधानमंतरी के नातियों को भी, उसी तरह आतंकियों से जेतना हम डरते हैं, ओतने परधानमंतरी।

'एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है' ई नाना पाटेकर का परसिद्ध डायलाग है। ऐसने आप भी एक ठो डायलाग बना सकते हैं-- 'एक आतंकवादी नेताओं को हिजड़ा बना देता है।' संसद पर हमला करवाने वाले अफजल को फांसी पर लटकाने में नेता लोग जैसन नौटंकी कर रहे हैं, ऊ यही तो दिखाता है। वैसे भी मच्छर औरो आतंकियों के बीच एतना समानता है कि हर बम बिस्फोटों की तरह डेंगू के लिए भी भारत सरकार पाकिस्तान औरो आईएसआई को दोषी ठहराकर अपना पल्ला झाड़ सकती है।

उस दिन अपनी प्रजाति पर गर्व करने वाला एक ठो मच्छर हमको मिला। उसने अपने औरो आतंकवादियों में जो समानता हमको बताई, उ हम आपको बताता हूं- -

दिल्ली पुलिस आतंकवादियों से डरती है, तो हमसे भी उनकी कंपकंपी छूटती है। आतंकवादियों के डर से बुलेट प्रूव जैकेट पहनने वाला जवान सब आजकल हमसे बचने के लिए मच्छर भगाने वाला क्रीम लगा रहा है। सच पूछिए, तो हम तालिबान जैसन आतंकियों का सबसे बड़का दोस्त साबित हो सकता हूं। कभियो तालिबान ने अफगानिस्तान में ड्रेस कोड लागू था, आजकल दिल्ली में हमने ड्रेस कोड लागू कर दिया है। बस ई समझ लीजिए कि मनचलों का हमने दिन खराब कर दिया है। का है कि दिल्ली की सुंदरियों का फंडा है- - कपड़े ऐसा पहनो, जो तन को ढंकने के बजाय उसको उघारे बेसी। लेकिन हमारे डर से आजकल इस फंडे से बालाओं ने तौबा कर ली है औरो पैर से सिर तक ढंककर निकलती हैं। कम कपड़ा पहनने वालियों के पास भी मनचले जा नहीं सकते, काहे कि वहां से मच्छर भगाने वाली क्रीम की बदबू आती है। अब आप समझ गए होंगे कि महीना भर से दिल्ली में एको ठो छेड़छाड़ की घटना काहे नहीं हुई है। ई मामला कुछ-कुछ वैसने है, जैसे आवारा भंवरा फूल तक तो पहुंचे, लेकिन उससे आ रही बदबू से ऊ बेदम हो जाए।

आश्चर्य की बात तो ई है कि अपने अस्तित्व को लेकर भी हम दोनों की सोच एके तरह की है। हम सोचता हूं कि जब तक एमसीडी औरो मेडिकल डिपाटमेंट में भरष्ट लोगों का बोलबाला है, हमारा कोयो कुछो नहीं बिगाड़ सकता, तो उधर आतंकवादियो सब निश्चिंत है कि जब तक भरष्टाचार, धरम औरो वोट का बोलबाला है, उनका कोयो कुछो नहीं बिगाड़ सकता। अब देखिए न, संसद पर हुए हमले में छह ठो जवान शहीद हो गए थे, लेकिन उनको का मिला? नेता सब को बचाने के चक्कर में ऊ बेचारे 'भूत' बन गए औरो हमला करवाने वाला अफजल हो गया 'हीरो'! हम तो कहते हैं कि ऊ लोग बुड़बक थे, इसलिए मर गए। अरे भइया, अगर आप भारत के सिपाही हैं, तो आपको पहिले ई तो पता कर ही लेना चाहिए न कि जिन आतंकवादियों के सामने आप छाती तानने जा रहे हैं, ऊ कश्मीरी औरो अल्पसंख्यक तो नहीं हैं। अगर ऐसा हो, तो संसद पर एटैक होने पर भी चुपचाप कोने में छिप जाइए, मरने दीजिए नेताओं को। आपका का जाएगा?

बहरहाल, हमको तो ई लगता है कि सरकार बेकारे आतंकवाद से लड़ने पर संसाधन लुटा रही है। हमरे खयाल से सरकार को बजाय आतंकवाद से सीधे लड़ने के, पहिले हम पर प्रयोग करना चाहिए। अगर ऊ हम पर कंटरोल कर लेती है, तो यकीन मानिए आतंकवादियों पर भी ऊ कंटरोल कर लेगी। अगर ऊ हम पर कंटरोल नहीं कर पाती, तो आतंकवाद पर कंटरोल करने की बात तो मुंगेरीलाल के हसीन सपनों जैसा है। अरे भइया, जब हम बिना धरम, जाति औरो वोट के हैं, तभियो सरकार से कंटरोल नहीं हो रहे, तो भला आतंकवादी कहां से कंटरोल होंगे, उनको तो इन सबका सहारा है!

6 comments:

जीतू said...

अच्छा लिखे हो. जियो बिहारी बाबू. नेतन लोगो को सही में अफजल कें कारिंदो के सामने छोड़े देना था उन शहीद सिपाहियों को.

Sagar Chand Nahar said...

हर बार की तरह बहुत बढ़िया व्यंग लेख, साधूवाद

भुवनेश शर्मा said...

वाह बिहारी बाबू मच्छर को केंद्र में रखकर अच्छा व्यंग्य है बधाई।

Polite Indian said...

well written..Mazaa aa gaya

ratna said...

बहुत अच्छा व्यंग्य लिखा है। बधाई।

इद्न्नम्म said...

अच्छा व्यंग्य किया है।