Friday, February 02, 2007

इक चेहरे पे कितने चेहरे...

हम आजकल परेशानी में हूं। हम ई नहीं समझ पा रहा हूं कि वास्तव में हम जा कहां रहा हूं। हमरे चेहरे पर एतना चेहरा लग गया है कि हम इहो भूल गया हूं कि हमरा असली चेहरा कैसन है! वैसे, हम अकेला ऐसन नहीं हूं, दुनिया के तमाम लोगों की स्थिति ऐसने है। हमको रोज ऐसन दस ठो जमूरा मिलता है, जिनका करतब देखके हमरे लिए ई डिसैड करना मुश्किल हो जाता है कि ऊ आदमिये है या कुछो और।

अपने रेल वाले नेताजी को ही लीजिए। उस दिन पूजा पर बैठे शताब्दी टरेन की इस्पीड से झूम रहे थे। पहले तो लगा कि रेल को दौड़ाते हैं, इसलिए उसके इस्पीड से झूमने की इनको आदत लग गई होगी, लेकिन तनिए देर में पता चला कि हुजूर तंत्र-मंत्र में लीन हैं। खुद बिहार से 'भूत' हो गए, तो अब ओझा बनकर दूसरों का भूत भगा रहे हैं। हमने कहा, 'एक आपका चेहरा उहो था, जब आपने बिहार में भूत-परेत भगाने वाले पाखंडियों को जेल में डालने के लिए कानून बनाया था औरो एक चेहरा ई है कि आप खुदे पाखंडी बने बैठे हैं! आपका असली चेहरा कौन-सा है?'

जनाब उबल पड़े। बोले, 'ई चेहरा-बेहरा का होता है? जब हम सत्ता में होता हूं, तो कानून बनाता हूं औरो जब सत्ताविहीन होता हूं, तो कानूनों को तोड़कर सही विपक्ष का रोल अदा करता हूं। सिम्पल बात है! हमने परिवार नियोजन कार्यक्रम की धज्जी उड़ाई, दो कम दर्जन भर बच्चे पैदा किए, लेकिन तभिये तक, जब तक कि सत्ता में नहीं थे। सत्ता में आने के बाद हमको एको ठो बच्चा हुआ? नहीं न। फिर? ऐसने जब हम बिहार में सत्ता में थे, तो 'एंटी विचक्राफ्ट एक्ट' बनाए औरो जैसने सत्ता से बाहर हुए खुदे ओझा बनकर भूत भगा रहा हूं। गांधीजी सत्याग्रह से कानूनों का विरोध करते थे, हम ओझा बनकर ऐसा कर रहा हूं! वैसे, आप हमरे पीछे काहे लगे हैं? उससे काहे कुछ नहीं पूछते, जो मंगल दोष दूर करने के लिए आजकल भारत भ्रमण कर रहा है?'

उनका आइडिया हमको पसंद आया। हम पहुंच गए भारत भर के मंदिरों में इन दिनों तंबू लगा रहे लंबू जी के पास? हमने पूछा, 'आपको का हो गया? कहां तो आप रस्म-रिवाज तोड़ने वाले एंग्री यंग मैन थे, 'बाबुल' में आपने बहू का विधवा विवाह करवाया औरो कहां अब होने वाली बहू का मंगलदोष दूर करने के लिए मंदिरों में भटक रहे हैं। आपका असली चेहरा कौन-सा है?'

लंबू जी ने पहले तो नवरतन तेल लगाया, फिर पेप्सी पिया औरो फिर खाया च्यवनप्राश। हमने सोचा ई गोस्सा नहीं दिखाने के लिए कूल हो रहे हैं औरो इनर्जी के लिए च्यवनप्राश खा रहे हैं, लेकिन तनिए देर में ऊ गरम हो गए औरो लड़खड़ाकर गिर गए। फिर संभलकर बोले, 'देखिए, इन तीनों चीज के उपयोग से हमको कौनो फायदा हुआ? नहीं न। जबकि विज्ञापन में हम इनका एतना फायदा गिनाता हूं। अब आप समझे! का है कि हम मूरख नहीं हूं। हम तो जनता को मूरख बनाता हूं। तो मंदिरों में तंबू लगाने के पीछे भी यही कारण है। देश के पंडे-पुजारियों औरो खबरिया चैनलों ने हमको अपना बिजनेस चमकाने के वास्ते 'ब्रांड एम्बेसडर' बनाया है, इसलिए ई सब कर रहा हूं। अब जनता मूरख बन रही है, तो हमरा का दोष?'

हमरा कन्फ्यूजन अभियो दूर नहीं हुआ था, इसलिए हम जा पहुंचे अपने गुरुजी के पास। ऊ बोले, 'बेटा, ई कन्फ्यूजन नहीं, फ्यूजन का जमाना है। अगर तुम कथक औरो रॉक को मिलाकर 'कथरॉक' जैसन कुछो बना सको, तो दुनिया तुमको बिरजू महाराज औरो माइकल जैकसन से बेसी काबिल मानेगी। इसी का जमाना है। रथ में बीएमडब्लू का मशीन लगाकर चलाओ, तभिये माडर्न कहलाओगे। इसीलिए बेसी परेशान मत हो। का है कि परेशानी में असली चेहरा सामने आता है औरो अगर असली चेहरा सामने आ गया, तो कोयो तुमको पूछेगा नहीं! जरा सोचो, अगर लंबू जी औरो उ मंतरी जी का रोज एक नया चेहरा लोगों के सामने नहीं आए, तो उनको पूछेगा कौन? चेहरा बदलने से लोगों की दिलचस्पी उनमें बनी रहती है औरो तभिये ऊ लोगों को उल्लू बना पाते हैं।' लगता है अब हमरा कन्फ्यूजन दूर हो गया है!

7 comments:

संजय बेंगाणी said...

अब कोनो कनफ्युजन बचा नाहीं है.
सब पबलिसिटी स्टंट है भाई.
कोई समाज सुधार का ठेका लिये है का? बुडबुक असली चेहरा ढ़ूंढ रहा है.
हमरा कोनो असली चेहरा ना होना ही,असली चेहरा है रे.

Sunil Deepak said...

यानि हाथी के दाँत, खाने के और दिखाने के और.

अनूप शुक्ला said...

बेहतरीन लेख लिखते हो भाई !

Shrish said...

झकास लिखे हो भईया। मजा आई गवा। लंबू भैया तो आजकल गंजे को कंघी भी बेच दें। उनकी तो माया अपरम्पार है। :)

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन-बड़ा झूम के लिखा है, बधाई. जारी रहो!! :)

Raag said...

मान गए आपकी लेखनी को झा जी।

राजीव said...

बड़ा ही उम्दा लिखा है बिहारी बाबू! न केवल यह बल्कि आपके अऊरो लेख भी अईसेईन बढ़िया हैं। बिलकुल बिहार की प्रचलित शैली का आनन्द देते हैं।