Thursday, February 15, 2007

हीर-रांझा की कहानी में ट्विस्ट

ग्लोबलाइजेशन के इस युग में 'प्रेम रोग' ने 'महामारी' का रूप ले लिया है। तमाम लोग कहते हैं कि प्रेम के ये कीटाणु वेस्टर्न कल्चर ने फैलाये हैं, लेकिन शायद यह पूरी तरह सच नहीं है। इसके बजाय अगर ये कहा जाए कि प्रेम का आज का स्वरूप वेस्टर्न कल्चर की देन है, तो ज्यादा सही होगा, क्योंकि प्रेम तो भारतीय संस्कृति में सदियों से रचा-बसा रहा है। हां, यह बात और है कि ऐसा उच्छृंखल वह कभी नहीं रहा, जैसा कि आज है :

अक्सर प्रेम के सौदागरों को हीर-रांझा या रोमियो-जूलियट की उपाधि दी जाती है। लेकिन अब के प्यार के परिंदों के लिए शायद यह उपयुक्त नहीं। हीर- रांझा होना आज के समय में बहुत मुश्किल है। अब न तो रांझा का वह दिल है, जो सिर्फ हीर के लिए धड़कता है और न ही वह हीर है, जिनकी आंखें रांझा के दीदार के लिए तरसती थीं। कहते हैं न कि सस्ती चीज की कीमत नहीं होती, तो ऐसा ही कुछ प्यार के साथ हुआ है। प्यार अब इतना सस्ता हो गया कि उसकी कीमत ही नहीं बची।

शायद यही वजह है कि दिल लगाना आज जितना आसान है, उतना ही आसान है उसका टूटना भी। हीर-रांझा को छोडि़ए, अब तो लोग देवदास तक नहीं होते। दिल के तार आए दिन एक नेटवर्क से टूटते हैं और जल्दी ही फिर किसी दूसरे नेटवर्क से जुड़ जाते हैं। मोबाइल दिल कभी लव के नेटवर्क से बाहर नहीं होता। जब अपना नेटवर्क काम न करे, तो दूसरे के नेटवर्क का सहारा ले लो--आज तो मल्टीपल डेटिंग का जमाना है। न हीर को इससे मुश्किल होती है और न रांझा को। तभी तो लोग कुछ इस भाव से भी लव के गेम में कूदते हैं-- तू उसके साथ भी डेट पर जा और मेरे साथ भी। इससे जब मुझे नहीं ऐतराज है, तो तुम्हें क्यों होने लगा? तुम्हें भी पता है कि तुम मुझे फ्लर्ट कर रही हो और मुझे भी पता है कि तुम ऐसा ही कर रही हो। बावजूद इसके, मुझे सुकून रहेगा कि अपने सर्कल के लोग मानेंगे कि हमारे बीच प्यार है। मेरे पास एक अदद गर्लफ्रेंड है, इससे मेरी नाक कटने से बच जाएगी और तुम जितने अधिक को 'घुमा' सको, वह तो तुम्हारी काबिलियत ही गिनी जाएगी! तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि अपनी कुर्बानी देकर मैं तुम्हारी डिमांड बढ़ा रहा हूं।

तो यह है जमाना। आज प्यार में तमाम एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं, फिर भी दिल की दुकानदारी में जल्दी बोहनी नहीं होती। चाहत की प्यास दिनोंदिन बड़ी होती जा रही है। कोई दिल को पसंद आता है, तो वह पट नहीं रहा होता और जो पट रहा होता है, उसे दिल नहीं पसंद करता। जहां पहले प्यार के दीदार में दिन नहीं, महीने और साल बीत जाते थे, वहीं अब जब चाहो तब दर्शन हो जाते हैं-- न पनघट पर जाने का बहाना और न ही स्कूल- कॉलेज जाने के बहाने मुलाकात की ताक। जब चाहो, तब मिलो। मुलाकात नहीं हो रही, तो आवाज सुनने से तो अब दैव भी नहीं रोक सकते, बापू और ताऊ की क्या मजाल--मोबाइल की माया जो है। दिल अगर बात करने को चाहे, तो मोबाइल जहन्नुम में भी नेटवर्क ढूंढ ही लेगा।

वैसे, आज प्यार खुद ही अपना रास्ता नहीं बना रहा, बल्कि रास्ते प्लानिंग के तहत बनाए भी जा रहे हैं। मेट्रो सिटीज में 'स्पीड डेटिंग' आयोजित होती है। कुछ पैसे भरिए और बाजार द्वारा आयोजित अपने 'स्वयंवर' में पहुंच जाइए। कोई मिल गया ढंग का, तो कुछ दिन जीने का सहारा मिल जाएगा, नहीं मिला, तो फिर दूसरे में पहुंच जाइए-- किसी इन्फीरियर या सुपीरियर ग्रंथि का शिकार होने की जरूरत नहीं है। अगर अपने लिए कोई तोता या मैना नहीं मिल रहा, तो इंटरनेट पर जाइए। वहां घंटा-दो घंटा साथ काटने से लेकर जीवन भर साथ देने वाले ऑफर्स की भरमार है। खुद झारखंड में रहिए और प्रेम कीजिए मैनहट्टन की माशूका से। महबूबा का दीदार वेब कैम पर कीजिए और बाकी चीजों के लिए? उसके लिए तो मन की आंखें हैं ही! क्या हुआ महबूबा पास नहीं है, प्यार की खुमारी में महीनों तो गुजर ही जाएंगे! एक छूटी, दूसरी ढूंढ लीजिए। सिलसिला रुकने वाला नहीं है, आप ग्लोबल विलेज में जो रह रहे हैं।

प्यार जबरन ठूंसा भी जा रहा है। अब बात आंतरिक सुंदरता की नहीं, बाहरी सुंदरता की होती है। प्यार गरीबी से भी नहीं होता। युवा चेन स्नैचिंग करते हैं, ताकि महबूबा के सामने हीरो बनकर महंगी बाइक या कार से पहुंचा जाए और उसकी महंगी फरमाइशें पूरी कर सकें। अब हैंडसम और जेब से मजबूत बंदे से फ्लर्टिंग का शिकार होना गुनाह नहीं है, तो हूर की परी पर दादाजी की उम्र के लोग भी मेहरबानी लुटाने से बाज नहीं आते--उम्र चूकने से दिल तो नहीं चूकता ना।

हालांकि बावजूद इतनी सुविधाओं के प्यार की तासीर बढ़ने के बजाय कम ही हो रही है। जब तक शादी नहीं होती, हीर हीर और रांझा रांझा नजर आते हैं, लेकिन एक दिन में सब कुछ बदल जाता है। दरअसल, प्यार की नींव इतनी कमजोर होने लगी है कि वह प्यार की अपेक्षाओं का बोझ झेल नहीं पाती। प्यार के परिंदे गृहस्थी के घोंसले में पहुंचते ही अपनी गलती पर पछताने लगते हैं। शायद यही वजह है कि जिस गति से लव मैरिज की तादाद बढ़ रही है, उसी गति से बढ़ने लगा है तलाक भी। यह तलाक की बढ़ती दर ही है कि प्यार के इतना सुलभ होने के बावजूद न तो पैरंट्स और न ही प्यार करने वाले इतना श्योर हो पा रहे हैं कि उनका रिश्ता जन्मों-जन्मों का है।

आप कह सकते हैं कि प्यार अपनी मौत मर रहा है। कम से कम भारतीय मूड का जो प्यार है, उसके साथ तो ऐसा ही है। शायद यही वजह है कि जिस दर से प्यार के परिंदे अपने समाज में बढ़ रहे हैं, उतनी ही तेजी से उजड़ रहा है उनका घोंसला भी। फिर भी वैलंटाइंस डे की अपनी अहमियत है, क्योंकि कुछ ही समय के लिए सही, दिल को सुकून देने वाला एक शख्स तो चाहिए ही। तो प्यार जरूर कीजिए, लेकिन दुकानों में चिपकी रहने वाली इस चेतावनी को ध्यान में रखते हुए-- फैशन के इस दौर में किसी गारंटी की उम्मीद न करें।

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