भारत किरकेटिया विश्व कप से पहले ही राउंड में बाहर हुआ नहीं कि लगा जैसन देश में करोड़ों एबोरशन एक साथ हो गया हो। हर कोयो स्यापा मना रहा है, जैसे यह विश्व कप न होकर विश्व युद्ध हो औरो बांग्लादेश से हारकर देश अब बस गुलामी के जंजीर में जकड़ा जाने वाला हो। सच बताऊं, तो किरकेट के लिए लोगों को एतना परेशान देखकर हम कन्फ्यूजिया गया हूं कि ई भारत ही है या हम किसी दूसरे मुलुक में आ गया हूं!
हमरे कन्फ्यूजन की वजह ई है कि एके दिन में हमको अपना देश पलटता हुआ लग रहा है। आज किरकेटरों को पानी पी-पीकर गरियाने वाला ई मुलुक, वही मुलुक है, जिसकी जनता सैकड़ों निकम्मे-नाकारे नेताओं को दशकों से झेलती आ रही है, लेकिन उफ तक नहीं कहती! दो रोटी को तरशने वाला आदमी इसी देश में नेता बनते ही करोड़पति-अरबपति बन जाता है, लेकिन जनता उसको भरष्ट नहीं मानती औरो चुनावों में भारी बहुमत से जिताती रहती है। लालूओं, मुलायमों, बादलों, चौटालों, मायावतियों, जयललिताओं ... के इस देश में नेताओं की काली कमाई पर सिर्फ उनके विरोधियों को ऐतराज रहता है, समर्थकों को नहीं!
यह वही देश है, जिसकी जनता धरना-परदरशन करना भूल गई है। पांच रुपया किलो का प्याज पचास रुपया किलो बिकता है, लेकिन लोग विरोध के लिए घर से बाहर नहीं निकलते। निठारी, सिंगुर, नंदीग्राम औरो मंजूनाथ जैसन कांड इसी देश में होते हैं, लेकिन पीड़ितों को छोड़कर कोयो और इसके विरोध के लिए अपनी नींद खराब नहीं करता। यह वही देश है, जहां कम्युनिस्ट तक सत्ता में टिके रहने के लिए पूंजीवादी बन जाते हैं औरो कामरेड पूंजीपति का गुर्गा बनकर भूखी जनता पर गोली चलाते हैं!
अब आप ही बताइए, जब एतना कुछ इसी देश में हो रहा है, तो बेचारे किरकेटरों को काहे निशाना बनाया जाए? जब हम खुद की नाक कटने का गम नहीं मनाते, तो हम ई काहे मान लें कि विश्व कप से बाहर हो जाने से देश की नाक कट गई! जब हम तमाम भरष्ट नेताओं को बार-बार जिताकर लोकसभा औरो विधानसभा में भेजते रहते हैं, तो हमें सहवाग औरो धोनी के टीम में रहने पर काहे आपत्ति होनी चाहिए? जब हम चावल-दाल के सट्टेबाजी पर कौनो आपत्ति नहीं जताते, तो किरकेट के सट्टेबाजी पर हमको काहे आपत्ति होनी चाहिए? जब हमरे देश के तारणहारों को हर समस्या का समाधान विदेश में ही मिलता है, तो बेचारे चैपल को हार के लिए काहे गरियाया जाए? जब हम किरकेट के उन तमाम 'मठाधीशों' से, जिन्होंने जिंदगी में कभी बैट-बॉल नहीं पकड़ा, ई नहीं पूछते कि ऊ बीसीसीआई में क्या कर रहे हैं, तो द्रविड़ औरो तेंदुलकर से हम ई क्यों पूछें कि ऊ टीम में क्या कर रहे हैं?
अब जब देश में एतना कुछ गलत हो रहा है औरो उनसे हमारा-आपका कोयो इमोशन नहीं जुड़ा, तो भला किरकेट से इमोशन जोड़कर क्या कीजिएगा? अगर किरकेट के खेल में नाक कटने से हम-आप इतने परेशान हैं, तो जरा उन चीजों के बारे में भी हमें सोचना चाहिए, जिनसे हमारी नाक रोज कटती है! गरीबी में अव्वल होने से हमरी नाक कटती है, भरष्टाचार में अव्वल होने से हमरी नाक कटती है, किसानों के आत्महत्या से हमरी नाक कटती है औरो न जाने किस-किस से हमरी नाक कटती है, लेकिन हम उनमें से कितने को अपनी 'नाक' का सवाल मानकर धरना -परदरशन करते हैं? और जब हम ये सब नहीं करते, तो भला नसीब के खेल किरकेट को लेकर विरोध परदरशन काहे किया जाए?
Thursday, March 29, 2007
गम और भी हैं जमाने में किरकेट के सिवा
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7 comments:
सही है, महाराज!!
ई बात तनिक अपन मीडिया के भी तो समझाई दियौ।
मीडिया ने ही अपने धंधे के लिए क्रिकेट को देश का धर्म बना दिया है। मीडिया जनता की आवाज और दिमाग का काम कर सकता था। लेकिन नहीं, उसे तो अपना धंधा करना है। आप दोष जनता को ही नहीं दे सकते। मीडिया बाजार की गुलाम बन चुकी है। वह न तो जनता की आवाज और चेतना को स्वर दे रही है और न ही उसे कोई सार्थक दिशा दे पाने के लायक रह गई है।
बिलकुल सही फर्माया बिहारी भैया - बहुत अच्छा लिखते हैं आप।
जवाब नहीं आपका, बिलकुल सही लिखे हो।
bahut badia
आप बहुत सहि कह रहे हैं । अभी देखिये ना Prof Sabharwal के मुकादमा में ऐक आदमी नहि मिल रहा है गवाहि के लिए , कया होगा कुछ समझ में नहि आता है ।
बहुत धाँसू लेखक हैं आप। बहुत सही बातें लिखते है और बहुत इन्ट्रेश्टिन्ग तरीके से।
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