Thursday, June 14, 2007

निरमोही विदेशिया कोच

लीजिए, अभी एक लात का दर्द हम भूलबो नहीं किए थे कि दूसरा पड़ गया। एक ऊ 'भगवान' गरेग चैपल थे, जिन्होंने पहले तो इस निरीह किरकेटिया देश को सरेआम उंगली दिखाई दी, फिर टीम की ऐसन लुटिया डुबोई कि बांग्लादेश हम पर भारी पड़ गया औरो अब ई एक गराहम फोर्ड बाबू हैं, जिन्होंने आने से पहले ही देश को जुतिया दिया। बताइए, केतना उमीद से हमने 'स्वयंवर' रचा के उन्हें अपना तारणहारण नियुक्त किया था औरो केतना बेदरदी से उन्होंने हमरी उम्मीदों को मटियामेट कर दिया! कहां तो हम उनसे किरकेट खिलवाना चाहते थे औरो कहां ऊ हमरे इमोशन से खेल गए!

फोर्ड बाबू, काश! आप हमरे देश के सवा अरब जनता के उम्मीदों पर ऐसन पानी फेरने से पहले एक बार सोच लिए होते। केतना निरमोही हैं आप भी? बताइए, फिक्सिंग से हम केतना नफरत करते हैं कि हमने अजहर औरो अजय जडेजा जैसन अपने स्टार पिलयर को हमेशा के लिए टीम से निकाल दिया, लेकिन आप एक 'भगवान' थे कि फिक्सिंग में आपका नाम आने के बादो हमने आपको साल भर पूजना स्वीकार किया, लेकिन आपने हमारे इमोशन की...! एतना ही नहीं, हमने आपको ई जानते हुए भी 'भगवान' माना कि आप पर घोर नसलवादी होने का आरोप है। जबकि हम नसलवाद के केतना खिलाफ हैं कि बैठे-बिठाए शिल्पा शेट्टी जैसन रिटायर हो रही हीरोइन को गलोबल परसनैलिटी बना देते हैं। सही बताऊं, एतना छूट तो हम ऊपर बैठे उस भगवान को भी नहीं देते, जिसके बारे में हम मानते हैं कि उसकी किरपादृष्टि हो जाए, तो सहवाग जैसन खिलाडि़यो हर मैच में तिहरा शतक ठोक सकता है औरो हम हर मैच में आस्टेलिया को धूल चटा सकते हैं।

वैसे, फोर्ड बाबू ने हमरे 'भगवान' बनने की प्रार्थना स्वीकार नहीं की, तो इसमें उनकी कौनो गलती नहीं है। अब का है कि अगर हमको लगता है कि विदेशी कोच ही हमको किरकेट के भवसागर से पार लगा सकता है, तो ई हमरा पिराबलम है, विदेशियों की नहीं-- ऊ तो अपने ही कोच से खुश रहते हैं। आज तक कभियो कोई देश गावस्कर या कपिलदेव से कोच बनने के लिए गिड़गिड़ाने नहीं आया, भले ही इन महारथियों के नाम केतना भी रिकार्ड काहे न हो। औरो एक हम हैं कि हर ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे विदेशी कोचों के चरण-चंपन में लगे रहते हैं कि ऊ हमरी किरकेटिया टीम का तारणहार बनकर हमें कृतार्थ करें।

बहरहाल, गरेग बाबू औरो फोर्ड बाबू के अंदाज को देखकर तो हम गनीमत मानता हूं कि अभी तक विदेशी लोगों की बात खेलों तक ही सीमित है। जिस दिन बात खेल से निकलकर विदेशी नेताओं के भारत में आयात पर आ जाएगी, पता नहीं उस दिन इस देश का का होगा? वैसे भी अभियो तक अंगरेजों के बनाए तमाम कानूनों पर ही चल रहे इस देश में ऐसन लोगों की कोयो कमी नहीं है, जो फिर से अंगरेज को देश में बुलाना चाहते हैं, ताकि देश पटरी पर चल सके।

2 comments:

Jagdish Bhatia said...

बहुत ही अच्छा लिखा है प्रिय।
हमेशा की तरह क्लासिक :)

Anonymous said...

badhiya hai. likhte raho....