Tuesday, July 10, 2007

कम कपड़ा, बेसी कल्याण

पिछले दिनों कपड़ा उतारने की दो- तीन घटनाओं ने मंगरू को बेचैन कर दिया है। नहीं, उसकी बेचैनी इस बात को लेकर कतई नहीं है कि सभ्य समाज को कपड़ा नहीं उतरना चाहिए। इस दौर में तो पूरा कपड़ा में ऊ सभ्य समाज की कल्पने नहीं कर सकता! ऊ तो ई जानने के लिए बेचैन है कि आखिर कपड़ा उतारने की नौबते काहे आती है औरो आती है, तो उसका कौनो फैदा होता है कि नहीं?

कपड़ा उतारने की पहली घटना के बारे में उसको पता चला कि यह काम उस गरम ... ऊ का कहते हैं... हॉट मॉडल की है, जो चलती टरेन पर छैंया छैंया गाकर रेल के नियम-कानून को ठेंगा दिखा चुकी है। ई जानकर मंगरू बहुते खुश हुआ। आखिर ऊ टरेन के छत पर नाच-गाकर भारतीय गरीबों को रेल की मुफ्त सवारी का रास्ता जो बता चुकी है। मंगरू खुदे बहुते बार ऐसन सवारी कर चुका है।

खैर, तो नाम मात्र के कपड़ा में फोटुआ खिंचवाकर उस माडल ने घोषणा की कि ऐसा महान काम उसने यह जागरूकता फैलाने के लिए किया है कि मकाऊ तोते के जान पर आफत आ पड़ी है, इसलिए उसको बचाया जाए।

ई जानकर मंगरू एक बार फिर खुश हुआ। उसको पूरा भरोसा है कि मुफ्त टरेन यात्रा का रास्ता दिखाने वाली माडल उसको फिर से रास्ता दिखाएगी औरो उसके कल्याण के लिए भी वही करेगी, जैसन उसने तोते के लिए किया है। आखिर उसकी हालत उस तोते से बेसी खराब जो है।

ऊ पहुंचा उस माडल के पास। कहने लगा, 'काश! हमरे कल्याण के लिए भी इस दुनिया में कोयो कपड़ा उतारकर परदरशन करता। कोयो कहता कि हमने ऐसा इसलिए किया, काहे कि मंगरू भूखा मर रहा है, उसको बचाइए। अगर आप ऐसा कर दीजिए, तो हमरी सूखी आंत भी लोगों को दिख जाएगी। जानवरों के लिए तो आप हसीनाएं एतना कुछ करती हैं, तनिक मनुष्य के लिए भी कुछ कीजिए न।'

माडल ने उसे गौर से देखा औरो अपनी बेबसी बताई, 'बात तो तुम सही कहते हो, लेकिन जानवरों के लिए कपड़ा हम इसलिए उतारती हूं, काहे कि उनसे हमरा फैशन चलता है। खरगोश के खून से मस्कारा, हाथी दांत के गहने, हिरण से शहतूश के शाल ... यानी हमरी चमक -दमक जानवरों के बल पर है। अब हमरे कारण जिसका पराण जाता है, उसके लिए कुछ तो हमको करना ही चाहिए न। तुमको तो नेताओं से मिलना चाहिए, वही तुम्हरे लिए कपड़ा उतार सकते हैं, काहे कि उनकी चमक-दमक तुम्हरे जैसन आम लोगों के कारण ही है।'

निराश मंगरू कपड़ा उतारने की दूसरी घटना के बारे में जानने गया। पता चला, राजकोट में ससुरालियों के खिलाफ कुछ कपड़े 'पहनकर' परदरशन करने वाली 'वीरांगना' को इसका वास्तव में फैदा हुआ है। अब बत्तीस ठो एनजीओ उसकी मदद कर रहा है, पैसा से लेकर नौकरी तक उसको आफर हो रहे हैं।

वीरांगना ने मंगरू को एक एनजीओ से मिलवाया। उसके बाद से मंगरू की कोटर से बाहर निकली आंखें सौ वाट के बल्ब की तरह चमक रही हैं। वह अब खुद माडल बनेगा, एनजीओ के पास जाएगा औरो अपने कल्याण के लिए खुद अपने कपड़े उतारेगा। आखिर भूखमरी से ग्रस्त भारतीय आदमी का मंगरू परफेक्ट माडल जो है। नेताओं से तो उसको उम्मीद ऐसे भी नहीं है, भला नंगा आदमी किसी के लिए कपड़ा कहां से उतारेगा!

1 comment:

Anonymous said...

lekin mangru ko dekhega kaun, usake liye to usako agent rakhana hoga, ngo to sara paisa khud khaane mein magan rahate hain....