Saturday, November 03, 2007

पावर से लैस बनाम पावरलेस

ऐसे तो दुनिया में हर चीज की अपनी-अपनी महिमा है, लेकिन जेतना महिमा पावर में है, ओतना किसी में नहीं। अपने देश के नेताओं और विद्वानों ने अपने वोट बैंक औरो दिमाग के हिसाब से चाहे समाज को जेतना टुकड़ा में बांट रखा हो, लेकिन हमरे खयाल से समाज में दूए तरह के लोग हैं- एक ऊ जो पावर से लैस हैं औरो दूसरा ऊ जो पावरलेस हैं।

पावर से लैस लोग जब चाहे, तब अपनी जिंदगी में उजाला बिखेर लेते हैं, लेकिन पावरलेस लोगों के लिए दिन भी राते जैसन होता है-- एकदम काला काला। पावर से लैस लोग जब चाहे, तब खबरों में छा सकते हैं-- चोरी करते पकड़ा गए तभियो, चोर को पकड़ लाए तभियो, लेकिन पावरलेस लोग चोर बनने पर ही खबरों में आते हैं, चोर पकड़ने पर कभियो नहीं। अगर पावरलेस लोगों ने चोर को पकड़कर रगड़ दिया, तो हल्ला मच जाता है--कानून को हाथ में ले लिया... कानून का शासन खतम कर दिया। यानी अगर आप पावरलेस हैं, तो लुट जाना आपका कर्त्तव्य है। पावरलेस आदमियों को चोरों से खुद को बचाने का कौनो राइट नहीं होता। तभियो नहीं, जबकि मरल पुलिस व्यवस्था का अघोषित नारा है 'अपने सामान की रक्षा स्वयं करे'। मतलब साफ है, जो पावर से लैस हैं, ऊ कमिशन खाकर चोरों को चोरी करने देते हैं औरो जो पावरलेस हैं, ऊ घूस देकर भी चोरी की रिपोर्ट नहीं लिखवा पाते!

हालांकि मिसिर जी का कहना है कि पावरलेस आदमी भगवान के भरोसे सुरक्षित रहता है, तो पावर से लैस आदमी अपने द्वारा तैयार किए गए भस्मासुरों के भरोसे। यानी पावर से लैस आदमी तभिये तक सुरक्षित है, जब तक कि उनके द्वारा तैयार भस्मासुर ने उस पर हाथ रखकर भसम नहीं कर डाला। वैसने जैसन अमेरिका तभिये तक सुरक्षित था, जब तक कि उसके अन्न औरो हथियार पर पले तालिबानों ने उसी पर हमला नहीं बोल दिया। तालिबानों ने जैसने उसके सिर पर हाथ रखा, ऊ असुरिक्षत हो गया! पता नहीं आपको का लगता है, लेकिन हमको मिसिर जी के बात में बहुते दम नजर आता है, काहे कि कुछ ऐसने दिल्लियो में हो रहा है।

दिल्ली में 'बिजली मीटर का रीडिंग लेना है' के बहाने घर में घुसकर चोरों ने हजारों लोगों को दिनदहाड़े लूट लिया, उनकी कहीं कौनो सुनवाई नहीं हुई। लेकिन एक दिन जैसने बिजली कंपनी के करमचारी के नाम एक आदमी दिल्ली के बिजली मंतरी के घर घुसा, मंतरी जी की हालत खराब हो गई। अब सरकार ने ऐसन आदमियों को घरों में घुसने से रोकने के लिए बिजली कंपनी से कहा है कि ऊ करमचारियों को आई कार्ड दे। ऐसन में आप भी शायद यही कहेंगे- काश! कि ऊ भला मानस बिजली मंतरी के घर में दू-चार साल पहले घुसा होता, दिल्ली में बहुतों लोग दिन-दहाड़े लुटने से बच गए होते। तो ई है, पावरलेस औरो पावर से लैस लोगों में अंतर।

ऐसने दिल्ली में बंदर बारहो महीना आतंक फैलाते हैं, लेकिन सरकार कुछो नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट कड़ा आदेश देता है, तभियो नहीं। बंदर बकोटते रहे लोगों को, एमसीडी को का मतलब! हां, बंदर पकड़ने औरो भगाने के नाम एमसीडी लाखों का बिल हर महीने बनाती जरूर है। ऐसन में एमसीडी के इस पाले-पोसे 'तालिबानों' ने एक दिन हद ही कर दी। वे भस्मासुर बन गए औरो एक ठो पार्षद जी को छत पर से ऐसन गिराया कि ऊ खुदा के प्यारे हो गए। बस आ गई इन मूढ़मति बंदरों की शामत, अब एमसीडी वाले बंदरों को दिल्ली क्या, पृथ्वी पर से खदेड़ देने की कसम खा रहे हैं। मतलब एक पावर से लैस आदमी की मौत ने ऊ कमाल कर दिया, जो हजारों पावरलेस आदमियो की मौत नहीं कर सकी! ई है पावर!

5 comments:

काकेश said...

पावर से लैस बनाम पावरलेस अच्छा चित्रण किया आपने.मजा आया.

http://kakesh.com

बाल किशन said...

वाह भाई जवाब नही आपका. क्या बात लिखी है. पढ़ कर मज़ा आगया. और भाषा भी बड़ी रोचक है.

अफ़लातून said...

ऐसे ही बाबा विनोबा कहते रहे , 'अ-सरकारी=असरकारी"

Sanjeet Tripathi said...

बहुत खूब लिखा आपने!

Raag said...

एकदमै सही कहे बिहारी बाबू।