Wednesday, November 14, 2007

गर नाम नहीं, नंबरों से मिले पहचान

नाम बिना किसी का काम नहीं चलता। यही वजह है कि लोग अपने बच्चों से लेकर डॉगी और यहां तक कि गाय-भैंस को भी एक नाम देते हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि अपने देश में लोगों को नाम के बजाय नंबरों से पहचान जाए? दरअसल, एक मोबाइल सर्विस प्रवाइडर कंपनी के एक विज्ञापन में दिखाया जाता है कि दो जातियों के झगड़े के बाद सरपंच फैसला करता है कि नाम की वजह से समाज में वैमनस्यता बढ़ती है, इसलिए गांव में अब सब अपने-अपने मोबाइल नंबरों से जाना जाएगा। यानी जिसका जो मोबाइल नंबर होगा, उसका नाम भी वही होगा। हालांकि विज्ञापन में इस आइडिया को हिट करार दिया जाता है, लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में भी यह आइडिया क्या उतना ही हिट हो सकता है? अधिकतर लोगों की राय में यह नामुमकिन है।

दरअसल, तमाम लोगों का मानना है कि भारत में नाम समस्या पैदा नहीं करता, समस्या की जड़ टाइटल है, जो यह शो करता है कि कोई किस कास्ट का है। जाति के खांचे में बंटे हिंदू और मुस्लिम दोनों में टाइटल ही सब कुछ है। समाजशास्त्री गीता दुबे कहती हैं, 'दरअसल, देश में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था पर चोट कर उसे ढहा देना इतना आसान भी नहीं है। दलित, मुस्लिम और ईसाइयों की समाज में मौजूदगी इस बात की तस्दीक करती है कि भारत में धर्म बदलने से लोगों की सामाजिक हैसियत में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। ठीक उसी तरह जिस तरह चुटकुले का छेदी लाल अपने नाम से परेशान होकर ईसाई धर्म तो स्वीकार कर लेता है, लेकिन वहां भी 'मिस्टर होल' ही नाम पाता है। ऐसे में संभव है कि लोगों के पास नंबर के बाद अपने टाइटल लगाने की भी मजबूरी हो, मसलन 9888888888 सिंह या 9888888888 मिश्रा या 9888888888 पासवान।'

जाहिर है, अगर देश में ऐसा कानून भी बन जाए कि हर व्यक्ति अपने मोबाइल नंबर से पहचाना जाएगा, तो भी बहुत ज्यादा फर्क नहीं आने वाला। ऐसे में संभव है कि समाज के लोग इस बात पर अड़ जाएं कि अगड़े की पहचान एक खास सीरीज के नंबर से ही होगी, तो दलित की पहचान एक अलग खास सीरीज के नंबरों से। ब्राह्माणों की जिद रहेगी कि उन्हें एक खास सीरीज का ही नंबर चाहिए, तो क्षत्रिय अपने लिए कोई फड़कता हुआ सीरीज ही चाहेंगे। इसी तरह दलित एकता की जिद एक ही सीरीज के लिए हो सकती है, तो यादवों की जिद एक खास अलग सीरीज के लिए। जाहिर है, ऐसे में न सिर्फ जाति की पहचान छिपाना मुश्किल हो जाएगा, बल्कि ईजी सीरीज के नंबर पाने के लिए भी जातीय झगड़े खूब होंगे। आखिरकार जातीय पहचान अभी भी अपने देश में तमाम लोगों के लिए गर्व की बात तो है ही।

फिर सबसे बड़ा खतरा तो दिल्ली विधानसभा के पूर्व ठेकेदार अशोक मल्होत्रा जैसे लोगों से होगा, जो फैंसी नंबर पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, कितने की भी बोली लगा सकते हैं। हालांकि इसमें सबसे अधिक बल्ले-बल्ले मोबाइल प्रवाइडर कंपनियों की होगी। अभी अगर एक फैंसी नंबर के एवज में उन्हें लाखों रुपये मिल रहे हैं, तो ऐसी व्यवस्था लागू होने के बाद ऐसे नंबरों के लिए उन्हें करोड़ों मिलेंगे।

पब्लिक रिलेशंस के काम से जुड़े सुनील सिंह एक और बड़ी समस्या की तरफ ध्यान खींचते हैं। वह कहते हैं, 'बड़े बिजनेसमैन, लीडर या मार्केटिंग से जुड़े लोग एक से ज्यादा मोबाइल फोन रखते हैं। इनमें से एक नंबर ऐसा होता है, जिसकी जानकारी सिर्फ नजदीकी लोगों को होती है, जबकि दूसरे नंबर्स बाकियों के लिए होते हैं। जाहिर है, ऐसे में एक ही लोग के दस नाम होंगे। कोई उसे 9810 वाले सीरीज के नाम से बुलाएगा, तो कोई 9811 सीरीज वाले नाम से। संभव है किसी के लिए उसका नाम 9868 सीरीज वाला हो। फिर ऐसा भी होगा कि मोबाइल कनेक्शन बदलने पर एयरटेल रखने वाले बंदे का नाम वोडाफोन की सीरीज में बदल जाएगा और वोडाफोन का आइडिया में। जाहिर है, यह बेहद फनी सिचुएशन क्रिएट करेगा।'

फिर ऐसा भी संभव है कि किसी राज्य में राजनीति बदलने के साथ ही करोड़ों लोगों के नाम बदल दिए जाएं। उसी तरह, जिस तरह कि मुलायम सिंह यादव द्वारा अपने जाति के लोगों को पुलिस बल में भर्ती कराने के मुद्दे पर मायावती ने हजारों पुलिसवालों की नौकरी छीन ली। जरा कल्पना कीजिए कि अगर मुलायम ने स्वजातीय वोट पाने के लिए अपने जाति को कोई फैंसी सीरीज के नंबर वाले नाम अलॉट कर दिए, तो मुलायम के सत्ता से हटने के बाद उन करोड़ों लोगों के नाम का क्या होगा? संभव है कि मायावती सत्ता में आते ही मुलायम के निर्णय को पलटकर दलितों को फैंसी नंबर की सीरीज अलॉट कर दें और 9800 सीरीज वाले समुदाय का नाम बदलकर 9808 वाले सीरीज का हो जाए।

मुलायम और मायावती ही क्यों, जाति के नाम पर राजनीति करने वाली देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां ऐसा कर सकती हैं। पता चला कि वोक्कालिंगा समुदाय की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी ने सत्ता संभालते ही कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के सभी वीवीआईपी सीरीज छिनकर अपने समुदाय के लोगों को दे दिए और अगली बार जब लिंगायत समुदाय की नुमाइंदगी वाली सरकार बनी, तो उसने भी बदला ले लिया और वीवीआईपी सीरीज वाले लोगों के नाम बदल गए। अब ऐसे में तो बदलते रहिए साल दर साल नाम, जितनी बार सरकार गिरेगी-बनेगी, उतनी बार लोगों के नाम बदल जाएंगे। संभव है, इस तरह साम्प्रदायिक झगड़े भी बढ़े। अपने को सेक्युलर साबित करने के लिए तमाम ऊटपटांग हरकतें करने वाली राजनीतिक पार्टियां तब इस बात के लिए अड़ सकती हैं या फिर आंदोलन कर सकती हैं कि अल्पसंख्यकों को ऐसे नंबर वाले नाम दिए जाएं, जिससे उनकी पुख्ता राष्ट्रीय पहचान बन सके । जाहिर है, इससे देश का भला होने वाला नहीं है।

बहरहाल, निष्कर्ष यही है कि बात घूम-फिरकर अगर फिर से वहीं पहुंच जाए, जहां से शुरू हुई थी, तो ऐसी किसी कसरत का क्या फायदा!

4 comments:

बाल किशन said...

बात तो सही है ऐसी कसरत का क्या फायदा! फ़िर भी आपने और हमने की.

परमजीत बाली said...

सही बात है अगर इतन सब कुछ करके नतीजा कुछ निकलना ही नही तो इसे करनें से क्या फायदा होगा?

Aflatoon said...

लोग कहते हैं कि मोबाइल के नम्बर से उसकी सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी का पता चल जाता है-शुरुआती अंकों से। हर संख्या में जातिसूचक स्थान(मानिए इकाई से हजार) , क्षेत्र के लिए स्थान(पिनकोड की तरह) और आर्थिक औकात आदि भी देने की कल्पना की जा सकती है।उक्त विज्ञापन को देख कर लगता है मानो जाति समाप्त लेकिन सामन्तवाद शेष है ।

sunil said...

बहुत बढ़िया राइट-अप... तिल का ताड़ बनाकर फिर उसे यूं संवारा कि दिल गार्डन-गार्डन हो गया... असली कलमकार की पहचान तो यही है.. छाप छोड़ रहे हैं आप तो