Thursday, July 20, 2006

दुनिया है गोल

दुनिया गोल है, ई बात अब हमहूं दावे के साथ कह सकता हूं। जी नहीं, हम आपको जोगराफिया नहीं पढ़ा रहा हूं। हमरे कहने का मतलब तो बस ई है कि दुनिया में आप कहीं भी जाइए, स्थिति एके जैसी है। अगर चावल का एक दाना देखकर उसके पकने का अंदाजा चल सकता है, तो हम ई कह सकता हूं कि खाली हमरे लिए ही नहीं, दुनिया के हर देश के लोगों के लिए घर की मुरगी दाल बराबर होती है, अपनी स्थिति से कोई खुश नहीं रहता, जाम हर जगह लगता है औरो भरष्टाचार के शिकार सिरफ हमहीं नहीं, दूसरे देश के लोग भी हैं। हमको तो लगता है कि मरने के बाद स्वर्ग पहुंचने वाले लोग भी निश्चित रूप से अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं रहते होंगे।

का है कि अभी हम मलेशिया गए थे। चकाचक मलेशिया देखने के बाद हम ई सोचियो नहीं सकते कि पेट्रो डालर, पाम आयल औरो रबर से ठनाठन नगदी कमाने वाली जनता अपनी स्थिति से नाखुशो हो सकती है, लेकिन हकीकत यही है। एतना पैसा होने के बावजूद लोग औरो पैसा कमाने का साधन नहीं जुटाने के लिए सरकार को कोसते रहते हैं, तो मलेशिया की जिस खूबसूरती को देखने के लिए पूरी दुनिया से लोग आते हैं, वहीं की जनता उसे निहारना नहीं चाहती। हालत ई है कि झोला उठाकर दूसरे देश की सैर को जाने वालों में मलेशियाई लोगों का नंबर विश्व में दूसरा है। तो जनाब, घर की मुरगी को दाल सिरफ हमी नहीं समझते, दुनिया के दूसरे लोग भी समझते हैं।

घर की मुरगी दाल बराबर वाली बात का एक ठो बड़ा दिलचस्प वाकिया है। हमरे साथ एक ठो बंगाली बाबू भी मलेशियन सरकार के मेहमान थे। दिल्ली में पलेन पर चढ़ते ही उनका तकिया कलाम बन गया- - एनीथिंग बट इंडियन! मतलब कुछो चलेगा, लेकिन इंडियन नहीं। उनको हिंदी गाना नहीं सुनना, भारतीय खाना नहीं खाना, मलेशिया की भारतीय बस्तियों में नहीं जाना। उस महाशय को भारत जितना नरक जगह लगता था, विदेश उतना ही स्वर्ग। लेकिन संयोग देखिए कि इससे पहले कि बेचारे मलेशियाई खूबसूरती को देखते हुए अपने देश को बढि़या से कोस पाते, एक मलेशियाई ने उनका पानी उतार दिया। बाबू मोशाय को तब बड़ा झटका लगा, जब उनको मिले पहले ही मलेशियाई व्यक्ति ने उन्हें बताया कि कश्मीर, ऊटी औरो मसूरी बहुते खूबसूरत जगह है औरो ऊ छुट्टी बीताने के लिए सपरिवार यहां आता रहता है। अब जिस व्यक्ति के लिए दुनिया में दोए ठो स्वर्ग हो-कोलकाता और पेरिस, उसके लिए तो ई हजार वाट का झटका जैसा था।

हम एक ठो औरो निष्कर्ष पर पहुंचा हूं औरो उ ई कि सरकार प्राय: सहिए होती है, खोट बेसी जनते में होता है। मतलब सब परोबलम की जड़ जनता की सोच ही है। अगर दिल्ली के लोगों की सोशल स्टेटस बढ़ाने की चिंता ने यहां की सड़कों को कार से पाट दिया है औरो जाम आम हो गया है, तो मलेशिया में भी इसी ठसक के लिए हर कोयो अपनी कार से चलना चाहता है। परिणाम ई है कि वहां रोज हाई वे पर दस किलोमीटर लंबा जाम लगता है औरो सरकार इसका कोयो साल्यूशन नहीं निकाल पा रही। सरकार इधर साल में दो फीट रोड चौड़ा करती है और चार फ्लाईओवर बनाती है, तो उधर कारों की संख्या दस हजार बढ़ जाती है। अब सरकार सड़क को 'हनुमानजी' तो बना नहीं सकती कि टरैफिक के 'सुरसा' जेतना बड़ा मुंह फैलाए, सड़क ओतना बड़ा हो जाए!

खैर, विकास की सड़क तलाशते हुए पहुंच हम गए भरष्टाचार को तलाशने। आखिर खांटी भारतीय औरो उहो में खांटी बिहारी जो ठहरे! चकाचक मामले में भी खोट तलाशना तो अपना धरम है। सो गगनचुम्बी इमारत, चकाचक रोड, अरबों के तमाम पराइवेट प्रोजेक्ट्स देखकर तो एक बारगी लगा जैसे वाकई रामराज है, लेकिन इससे पहले कि हम निश्चिंत होते, एक दिन सवेरे पेपर पढ़कर चौंक पड़े, मलेशियन एयरवेज का एक ठो बड़का स्कैम सुर्खियों में था। बात औरो बहुते है, लेकिन निष्कर्ष एके है- - इस दुनिया में हर जगह स्थिति एके है, फर्क बस उन्नीस-बीस का है।

6 comments:

Sunil Deepak said...

हालाँकि तुम अपने परिचय में हमारी प्रिय दिल्ली की निन्दा करते हो इसलिए पहले तो सोचा कि तुम्हारी प्रशँसा नहीं करनी चाहिए पर फ़िर सोचा कि पढ़ कर मजा आया, बताना तो पड़ेगा ही. ऐसे ही लिखते रहिये.

अनूप शुक्ला said...

बहुतै बढ़िया लगा पढ़कर। देर से पढ़ा तथा देर से तारीफ किया इसका बुरा न माना जाये!

Jitendra Chaudhary said...

आओ बिहारी बाबू तोहार स्वागत है।सफ़र मे कौनो तकलीफ तो नही रही? हमका देर काहे हुई? अब का बतायी..
अब का है ना, हम इत्ती देर से तोहरा इन्तजार,दूसरे वाले प्लेटफरम पर करत रहे, थक कर वापस जाय रहिन , तभंई नारदजी बताए रहे कि बिहारी बाबू का ट्रेइनवा दूसरे प्लेटफारम पर आय रही। तभई देर भई।

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