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गर नाम नहीं, नंबरों से मिले पहचान

नाम बिना किसी का काम नहीं चलता। यही वजह है कि लोग अपने बच्चों से लेकर डॉगी और यहां तक कि गाय-भैंस को भी एक नाम देते हैं। ऐसे में क्या यह संभव है कि अपने देश में लोगों को नाम के बजाय नंबरों से पहचान जाए? दरअसल, एक मोबाइल सर्विस प्रवाइडर कंपनी के एक विज्ञापन में दिखाया जाता है कि दो जातियों के झगड़े के बाद सरपंच फैसला करता है कि नाम की वजह से समाज में वैमनस्यता बढ़ती है, इसलिए गांव में अब सब अपने-अपने मोबाइल नंबरों से जाना जाएगा। यानी जिसका जो मोबाइल नंबर होगा, उसका नाम भी वही होगा। हालांकि विज्ञापन में इस आइडिया को हिट करार दिया जाता है, लेकिन प्रैक्टिकल लाइफ में भी यह आइडिया क्या उतना ही हिट हो सकता है? अधिकतर लोगों की राय में यह नामुमकिन है। दरअसल, तमाम लोगों का मानना है कि भारत में नाम समस्या पैदा नहीं करता, समस्या की जड़ टाइटल है, जो यह शो करता है कि कोई किस कास्ट का है। जाति के खांचे में बंटे हिंदू और मुस्लिम दोनों में टाइटल ही सब कुछ है। समाजशास्त्री गीता दुबे कहती हैं, 'दरअसल, देश में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था पर चोट कर उसे ढहा देना इतना आसान भी नहीं है। दलित, मुस्लिम...