Wednesday, October 18, 2006

आप भी घी के दीये जलाइए

आजकल बाजार में दीवाली की चमक-धमक है। लेकिन हमरे समझ में ई नहीं आता कि ई रौनक आखिर है किसके भरोसे। कभियो लगता है कि ई चकाचौंध ओरिजिनल है, तो कभियो लगता है कि भरष्टाचार की बैसाखी के बिना बाजार चमकिए नहीं सकता। फिर जब से परधानमंतरी जी ने ई कहा है कि बिना दलाल के काम चलिए नहीं सकता, तब से हम औरो कनफूज हो गया हूं।

उस दिन चौरसिया जी मिल गए। पिछली बार मिले थे, तो बहुते दुखी थे, लेकिन इस बार उनका चेहर लालू जी जैसन लाल था। कहने लगे, 'स्थिति तो बहुते खराब हो गई थी, लेकिन अब ठीक है। बताइए, सरकार की सबसे दुधारू विभाग के सामने अपनी चाय-पान की दुकान है, लेकिन बोहनी तक नहीं हो रहा था। सीलिंग के चक्कर में सब बरबाद हो गया। पबलिक का काम होता था, तो किरानी बाबू सब पबलिक से अपना 'सत्कार' हमरी दुकान पर ही करवाते थे। उनको लेन-देन के लिए सुरक्षित जगह मिल जाती थी औरो हमरी दुकान चल जाती थी। लेकिन जब कोर्ट के डर से गलत को कौन पूछे, सहियो काम नहीं हो रहा था, तो हमरी दुकान चलती कैसे? खैर, अब मामला ठीक है, साहब से लेकर चपरासी तक टंच हैं।'

दरअसल, चौरसिया जी की चिंता ऐसने नहीं दूर हुई है। उनके पास ऊपर से बूंद-बूंद चू कर जो पैसा पहुंचा है, उसके लिए ऊ मंतरी जी की धरमपत्नी के आभारी हैं। उन्हीं की किरपा से तो चौरसिया जी के पास पैसा आया है। हुआ ऐसन कि ऐन दीवाली के मौके पर हाथ सूखा देख मंतरी जी की धरमपत्नी ने उनको बहुते हड़काया। आखिर जब ऊ पैसा लाएंगे नहीं, तो घर में दीवाली मनेगी कैसे? वेतन-भत्ता से तो बस भात-दाल चल सकता है।

घर की लक्ष्मी के हड़काए मंतरी जी ने अपने सचिव को हड़काया-- अगर 'जजमानों' से पैसा लाओगे नहीं, तो अपनी इज्जत का तो फलूदे न बन जाएगा। दीवाली जैसन परब पर एतना पैसा नहीं है कि किसी को एक डिब्बा मिठाइयो दे सकें।

मंतरी जी से हड़के सचिव ने अपने निचले अफसरों को हड़काया। उन अफसरों ने अपने निचले मातहतों को हड़काया, उन मातहतों ने अपने करमचारियों को हड़काया औरो इस तरह पैसा लाने की बात कलमघिस्सू बाबूओं तक पहुंची। सावन में स्वाति की बूंद का इंतजार कर रहे सीपि रूपी उन बाबूओं ने अपने दलालों को हड़काया-- खड़े-खड़े चौरसिया से पान खाते रहते हो, 'यजमानों' को पकड़कर लाओ तो हमहूं पान खाएं। बढि़या से दीवाली मनाना है, मुन्ना को पटाखे देने हैं, बीवी के लिए जेवर लाने हैं औरो अपने लिए कपडे़ खरीदने हैं, सो पैसे के लिए रिस्क तो लेना ही पड़ेगा।

फिर का था? दलालों ने 'यजमानों' को समझाना शुरू किया कि सीलिंग के लिए मंतरी जी कानून ला रहे हैं, किसी का मकान-दुकान टूटेगा नहीं, बस पकिया कागज बनवा लो। उनका समझाना काम आया औरो 'यजमान' आने लगे। इससे चौरसिया जी की दुकान पर भीड़ जुटने लगी औरो तिजोरी भरने लगी। जब बटुआ में पैसा हो, तो किसी का भी चेहरा लालू जी जैसन लाल हो सकता है।

लोग कहते हैं कि लक्ष्मी चंचला है, लेकिन हमको लगता है कि लक्ष्मी नदी है-- जब तक बहती रहती है, सब सुखी रहता है, चौरसिया जी से लेकर मंतरी जी तक, यानी बाजार से सरकार तक। तो आप भी इस नदी में हाथ धोइए औरो दीवाली पर घी के दीये जलाइए। हमरी शुभकामनाओं के संग-संग अब तो परधानमंतरियो जी का आशीर्वाद आपके साथ है!

2 comments:

Udan Tashtari said...

सावन में स्वाति की बूंद का इंतजार कर रहे सीपि रूपी उन बाबूओं ने अपने दलालों को हड़काया

बहुत सही दिये हो, बिहारी बाबू. लगे रहो.

इदन्नम्म said...

भईये, जब सरकार ही दलाली से बनी हो तो दलालों के बिना काम कैसे चलेगा।