Wednesday, September 27, 2006

विवादों की बरसी

इसे आप विवादों की बरसी कह सकते हैं। जी हां, अगर साल दर साल ऑस्कर में भारतीय फिल्मों को भेजने के मौके पर इसी तरह से विवाद खड़ा हो रहा है, तो इसे बरसी कहना जरा भी गलत नहीं है। दरअसल, ऑस्कर में भारतीय फिल्म को भेजे जाने के मुद्दे पर एक बार फिर से विवाद खड़ा हो गया है। 'लगे रहो मुन्नाभाई' की यूनिवर्सल अपील के दीवानों को 'रंग दे बसंती' को ऑस्कर के लिए भेजना जरा भी गले नहीं उतर रहा। तो क्या अवॉर्ड और नॉमिनेशन जैसे मुद्दे विवादित होने के लिए ही होते हैं या फिर 'रंग दे बसंती' वाकई 'लगे रहो मुन्नाभाई' के सामने बौनी है?

दरअसल, यह बेजा विवाद भी नहीं है। कहीं तो कुछ गड़बड़ है। पिछले साल को ही लें। तमाम फिल्म समारोहों में 'ब्लैक' ही छाई रही, लेकिन ऑस्कर के लिए भेजा गया 'पहेली' को, जबकि 'ब्लैक' की शानदार मेकिंग और बहुतायत में इंग्लिश के डायलॉग ऑस्कर के जजों को जल्दी समझ में आने वाली चीजें थीं। फिर यह दो घंटे की ही फिल्म थी और इसमें गाने भी नहीं थे, जो ऑस्कर के पैमाने के बिल्कुल मुफीद थी। बावजूद इसके, 'पहेली' को ऑस्कर में भेजने के पीछे तर्क यह था कि इसमें भारतीयता है, यह भारतीय समाज का चित्रण है और ऑस्कर में एंट्री के लिए यह होना जरूरी है। अब हम अगर इसी तर्क की कसौटी पर 'रंग दे बसंती' को कसें, तो ऑस्कर के लिए उसे चुनने पर सवालिया निशान लग ही जाता है।

फिल्म की प्रकृति की बात करें, तो दोनों ही फिल्में एक जैसी हैं। एक भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं की लड़ाई है, तो दूसरा गांधीवादी विचारधारा पर चलने की एक युवा की पहल। लेकिन अगर यूनिवर्सल अपील की बात करें, तो निस्संदेह मुन्नाभाई की गांधीगिरी डीजे के बसंती रंग पर भारी पड़ती है। भारतीय फिल्मों के प्लॉट को समझ से बाहर बताने वाले ऑस्कर के जजों के लिए गांधी व गांधीवाद कोई अनजाना प्लॉट नहीं होता और यह चीज ऑस्कर जीतने में हमें मदद कर सकती थी।

अव्वल तो यह कि ऑस्कर का आकर्षण ही हमारे लिए फिजूल की चीज है। इस बात से शायद ही कोई सहमत हो कि भारतीय फिल्मों को विश्व स्तर पर बेहतरीन फिल्म का दर्जा पाने के लिए ऑस्कर जैसे किसी मोहर की जरूरत भी है। फिर इस मरीचिका के पीछे भागने से पहले हमें इस हकीकत को भी स्वीकार करना होगा कि ऑस्कर अवॉर्ड पाने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, उन्हें पूरा करने के बाद वह भारतीय फिल्म रह ही नहीं जाएगी। और जब वह भारतीय फिल्म रह ही नहीं जाएगी, तो फिर ऑस्कर पाने की जिद क्यों? अगर भारतीय स्टाइल में बनी फिल्म को ऑस्कर नहीं मिलता, तो हमारे लिए वह बेकार की चीज ही तो है। अपनी हुनर पर हम तभी इतराएं न, जब ऑरिजिनल फॉर्म में उसे स्वीकार किया जाए। अगर हम किसी अवॉर्ड को पाने के लिए अपना मूल स्वरूप ही खो दें, तो वह अवॉर्ड किस काम का?

1 comment:

Tarun said...

हमने तो कहीं पढ़ा था कि मैने गांधी को नही मारा वाले साहेब अपनी फिल्म सीधे आस्कॅर में भेजने की बात कर रहे हैं।