Friday, September 29, 2006

बहुते पछताया रावण

हर साल हो रही अपनी बेइज्जती से इन दिनों रावण बहुते परेशान है। दशहरा और रावण दहन जैसे आयोजनों की दिनोंदिन बढ़ती भीड़ ने उसको कुछ बेसिए परेशान कर दिया है। उसके समझ में ई नहीं आ रहा कि जिस दुनिया के गली-मोहल्ला में रावणों की भरमार है, ऊ त्रेता युग के रावण को अब तक काहे जला रहा है। उसका कहना है कि जलाना ही है, तो यहां सदेह मौजूद कुछ रावणों में से एक-दू ठो को जला दें। इससे कुछ रावणो कम हो जाएगा औरो रावण दहन का कार्यक्रमो सार्थक हो जाएगा।

खैर, रावण ने फैसला किया कि दिल्ली भरमण कर ऊ अपनी दुर्दशा अपनी आंखों से देखेगा। कुंभकरण, मेघनाद को साथ लेकर रावण निकल पड़ा दिल्ली भरमण पर। दिल्ली घुसते ही उसे दिल्ली की अट्टालिकाएं दिखीं। रावण ने कहा, 'देखो जरा इन्हें, हमने तो वरदान में सोने की लंका पाई थी, लेकिन इनमें से बेसी रक्तपान के बाद बनी महलें हैं। ईमानदारी से कमाकर तो कोइयो बस अपना पेट ही भर सकता है, अट्टालिकाएं खड़ी नहीं कर सकता। क्या हमारी लंका से ज्यादा अनाचार नहीं है यहां? अगर ये सदाचारी होते, फिर तो दिल्ली झोपडि़यों की बस्ती होती। ये हमसे खुशकिस्मत हैं कि इन्हें मारने वाला कोई राम नहीं मिल रहा है। वरना इनकी दशा भी हमारी तरह ही होती।'

'लेकिन फिर इतने अनाचारी-दुराचारी होने के बाद भी हर साल वे हमें क्यों जलाते हैं?' मेघनाथ ने आश्चर्यचकित हो रावण से सवाल किया।

रावण ने गुरु गंभीर वाणी में कहा, 'बेटा, यह कलियुगी फिलासफी है। हर कोई समस्या के लिए दूसरों को ही दोषी ठहराता है।'

रावण आकाश मार्ग में कुछो औरो आगे आया। उसको गोल आकृति वाली एक ठो भव्य इमारत दिखी। रावण ने कहा, 'यह यहां की संसद है, अपनी राजसभा जैसी। यहां तुम्हें ढेरों विभीषण मिलेंगे। अपना विभीषण तो राम की पार्टी में मिल गया, लेकिन यहां का विभीषण 'डबल क्रॉस' करता है औरो हर सरकार में मंत्री पद पा जाता है, चाहे सत्ता एनडीए की हो या यूपीए की। इन्हें देखकर तो हमको पछतावा होता है कि बेकार हमने विभीषण को लात मारकर भगा दिया था। ऊ तो इनसे ज्यादा स्वामीभक्त औरो ईमानदार था।'

हम तो राक्षस थे। अनाचार अपना धरम था लेकिन यहां के लोग सब तो नेता बनते ही अनाचार के लिए हैं। ऊ पैसा लेकर प्रश्न पूछते हैं औरो संसद निधि का पैसा डकार जाते हैं। हिंसक प्रवृत्ति के ऊ इतने हैं कि संसदो में कुश्ती करने से बाज नहीं आते।

रावण तनि ठो औरो आगे बढ़ा। एक मैडम अपने चम्मचों के साथ रावण का एक विशाल पुतला जला रही थीं। रावण ने कुंभकरण से कहा, 'वत्स, इनकी पार्टी और सहयोगी पार्टियों में तुम्हारे जैसे बत्तीसों कुंभकरण हैं जो आदमी से लेकर सड़क तक खा जाते हैं औरो डकार भी नहीं मारते। तुम्हारे डकार से तो दुनिया हिलती थी औरो लोग समझ जाते थे कि तुमने ढेर सारे प्राणियों को खाकर अनाचार किया है। औरो ऊ देखो बूढ़े बाबा को, जब तक सत्ता में थे कुछ रावण औरो कुंभकरण उनके भी सहयोगी थे, लेकिन मुखौटे का कमाल देखो कि तब उन पर कार्रवाई करने में उनका हाथ कंपकंपाता था, लेकिन हमरे पुतले को जलाने में उनके हाथ पूरे सधे हुए हैं। अब तुम्हीं बताओ हमें जलाकर ये क्या पाएंगे?' मेघनाथ ने उसे साजिस बताया, 'हमें जलाकर ई लोग हमरी आड़ में अपनी जनता को आसानी से उल्लू बना लेते हैं।'

रावण ने कहा, 'जनता खुदे उल्लू बनती है, तभिये तो हर साल हमें जलाने की इन्हें जरूरत पड़ती है। जलाना ही है तो कुछ जिन्दा रावणों को जलाएं। दू-चार साल में हमको जलाने की जरूरते नहीं पड़ेगा।'

7 comments:

Atul Arora said...

झकास लेख है। बधाई।

Udan Tashtari said...

सही है...

Raviratlami said...

...जलाना ही है तो कुछ जिन्दा रावणों को जलाएं। दू-चार साल में हमको जलाने की जरूरते नहीं पड़ेगा।'...

ये जिन्दा 'रावण' ही तो पुतला दहन का नाटक करते फिरते हैं!

संजय बेंगाणी said...

सही लिखे हो भाई.

Sagar Chand Nahar said...

बहुत सुन्दर लिखा है, बधाई स्वीकार करें।

इदन्न्म्म said...

ठीक कह रहे हो भाई!

ratna said...

बढ़िया लिखा है।