Thursday, December 14, 2006

सीधी बात हजम नहीं होती

समय बदलने से लोगों की मानसिकता केतना बदल जाती है, हमरे खयाल से ई रिसर्च का बहुते दिलचस्प बिषय है। एक समय था, जब किसी काम में तनियो ठो लफड़ा होता था, तो हमरी-आपकी हालत खराब हो जाती थी। लगता था, पता नहीं किसका मुंह देखकर सबेरे उठे थे कि एतना परॉबलम हो रहा है। लेकिन आज अगर बिना लफड़ा के एको घंटा बीत जाता है, तो लगता है जैसन जिंदगी का सारा रोमांचे खतम हो गया। मतलब, लोगों को अब लफड़े में बेसी आनंद मिलता है। बिना लफड़ा के लाइफ में कौनो मजा नहीं होता।

अब वर्मा जी को ही लीजिए। बेचारे कहीं से आ रहे थे। एक ठो आटो वाले से लक्ष्मीनगर छोड़ने को कहा। आटोवाला बिना किसी हील-हुज्जत के मीटर से चलने को तैयार हो गया। अब वर्मा जी की हालत खराब! ऊ आटो पर बैठ तो गए, लेकिन उनको सब कुछ ठीक नहीं लग रहा था। एक झटके में अगर दिल्ली का कोयो आटोवाला मीटर से चलने को तैयार हो जाए, तो किसी अदने से आदमी को भी दाल में काला नजर आ सकता है या कहिए कि पूरी दाल काली लग सकती है। फिर वर्मा जी तो दिल्ली के नस-नस से वाकिफ ठहरे।

खैर, रास्ता भर उनके दिल में किसी अनहोनी को लेकर धुकधुकी तो लगी रही, लेकिन आटोवाले ने सुरक्षित उन्हें घर पर उतार दिया। पैसा देकर ऊ निबटे ही थे कि एक झटका उनको औरो लगा। उनको विशवास नहीं हो रहा था कि 'सर, मैं जाऊं' की जो आवाज उनके कानों में मिश्री घोल रही है, वह आटोवाले के श्रीमुख से ही निकली है! उसने चारों ओर देखा कि कोयो औरो बोल रहा होगा, लेकिन ई प्रश्न आटोवाला ही पूछ रहा था! वर्मा जी का गला भर आया, उ बस किसी तरह एतना बोल पाए, 'हां भैया, अब आप जाओ।' लेकिन दिल के अंदर अभियो तूफान मचा था, कहीं कुछो गड़बड़ जरूर है।

तो ई है बिना लफड़े की दिल्ली। अगर कोयो आपसे परेम वाला व्यवहार करे, तो आपका सिक्स्थ सेंस जाग्रत हो जाता है- कहीं कुछो गड़बड़ जरूर है। हमरे मकान मालिक बहुते बढि़या नेचर के हैं। हमको छोटा भाई मानते हैं, सो अक्सर साथ खाने पर बुलाते रहते हैं। उस दिन जब हमने आफिस में कहा कि आज हमारा लंच उन्हीं के यहां था, तो सबके कान खड़े हो गए। एक ने पूछा, 'तो उन्होंने कब आपको घर खाली करने को कहा है?' दूसरे ने पूछा, 'किराया बढ़ा दिया होगा औरो जोर का झटका धीरे से देने के लिए आपको लंच पर बुलाया होगा?' मतलब, सबका मानना ई था कि कि मकान मालिक औरो किरायेदार में एतना परेम हो ही नहीं सकता। मकान मालिक अगर मानवीयता दिखाने लगे, तो समझ जाइए कि कुछो गड़बड़ जरूर है।

यही स्थिति ऑफिस के बॉस के साथ रहती है। अगर बॉस ने आपको अपने केबिन में हाल-चाल पूछने भी बुला लिया, तो आपके सहकर्मियों में डुगडुगी बज जाती है- आज तो बच्चू की लग गई क्लास! जरा सोचिए, केबिन में आप दोनों जेंटलमैन की तरह बात कर रहे हैं औरो केबिन के बाहर इमेजिन किया जा रहा है कि बॉस रूपी बाघ के सामने आप बकरी की तरह घिघिया रहे होंगे।

तो ऐसन है जमाना! जैसन लोगों को देसी घी औरो शुद्ध दूध नहीं पचता, वैसने दूसरों का बढि़या व्यवहार भी उनसे जल्दी हजम नहीं होता। अगर आप सीधे हैं, तो लोग आपको या तो बेकूफ मानेंगे या फेरो घुन्ना। अब जब ऐसन है, तो कहिए भला, कोयो बढि़या इंसान काहे बनना चाहेगा? लोगों के सामने बेकूफ साबित होने से तो बढि़या है कि टशन में रहा जाए औरो सच पूछिए तो इसी टशन में लोगों का मानवीय चेहरा गायब हो रहा है! तो दोषी कौन है, हम-आप या जमाना?

6 comments:

संजय बेंगाणी said...

ये पिरोबलम कथा लिखने की कैसी सुझी. कोनो पिरोबलेम तो नहीं न भाई.

शशि सिंह said...

संजय भाई, ये अपने बिहारी बाबू के चेहरे की मासूमियत और व्यवहार का भोलापन देखेके कभी-कभी मुझे भी शक होने लगता है... कहीं कौनो पिरोबलम नहीं है.

भगवान आपको हर प्रॉब्लम से बचाये. शुभेच्छा!

Udan Tashtari said...

लगता है तभ्भिये लोग हमें घुन्ना मान रहे हैं :)

श्रीश । ई-पंडित said...

बात तो एकद़म सही बोले हो भईया। तनिक ई बताओ कि 'ठो' का मतलब का होता है, उ का है ना हम तो बिहारी केवला लालू चाचा से ही सुने हैं ना तो हमरा बिहारी ग्यान कमजोर है।

Priya Ranjan Jha said...

श्रीश जी,

'ठो' का प्रयोग संख्या बताने के समय किया जाता है. जैसे एक किताब को कहेंगे एक ठो किताब. इसका कोई विशेष शाब्दिक अर्थ नहीं कहा जा सकता. इस तरह के शब्द क्षेत्रीय बोलियों की खासियत होते हैं.

अनूप शुक्ला said...

प्रियरंजन जी, आपके लेख बहुत अच्छे लगते हैं मुझे। कल पता नहीं कैसे छूट गया यह लेख चर्चा करने से! खैर फिर कभी विस्तार से। बहुत अच्छा लिखते हैं आप! और तनि जल्दी-जल्दी लिखा करिये न!