Thursday, December 21, 2006

बीत गया साल पहेली में

एथलीट एस. शांति ने दोहा एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीता था, जो उससे छीन लिया गया। कहा गया कि महिलाओं की दौड़ जीतने वाली शांति महिला नहीं, पुरुष है। ई 'सत्य' जानकर बहुतों को झटका लगा, लेकिन हम पर इसका कोयो इफेक्ट नहीं हुआ। का है कि साल भर हम ऐसने झटका सहता रहा हूं। हमने जिसको जो समझा, ऊ कमबख्त ऊ निकला ही नहीं। जिसको हमने गाय समझा, ऊ बैल निकला औरो जिसको बैल समझा, ऊ गाय।

अब देखिए न, पूरे साल हम ई नहीं समझ पाए कि शरद पवार कृषि मंतरी हैं कि किरकेट मंतरी। उन्हीं के गृह परदेश में विदर्भ के किसान भूखे मरते रहे, आत्महत्या करते रहे, लेकिन उन्होंने कभियो चिंता नहीं की। पैसे का भूखा बताकर ऊ जगमोहन डालमिया को साल भर साइड लाइन करने में लगे रहे, लेकिन कृषि मंतरी होने के बावजूद उन्होंने विदर्भ में खेती बरबाद करने वाले पैसे के भूखे अधिकारियों को कुछो नहीं कहा। देश की खेती को दुरुस्त करने के बदले ऊ किरकेट की अपनी पिच दुरुस्त करते रहे।

हमरे समझ में इहो नहीं आया कि गिल साहब हाकी के तारणहार हैं या डुबनहार। ऊ तारणहार होते तो भारतीय हाकी अभी चमक रही होती, लेकिन चमक तो खतम ही हो रही है। इसका मतलब उनको डुबनहार होना चाहिए, लेकिन ऐसा भी नहीं है। काहे कि अगर ऐसा होता, तो उनको हाकी संघ से कब का बाहर कर दिया गया होता, लेकिन ऊ तो अभी भी तानाशाह बने अपनी मूंछ ऐंठ रहे हैं।

गिल जैसन मनमर्जी करने वालों की इस साल देश में कौनो कमी नहीं रही। अर्जुन बाबू को ही ले लीजिए। उन्होंने एक मिनिस्टरी का नामे बदल दिया। अब तक एचआरडी मिनिस्टरी का मतलब हम ह्यूमन रिसोर्सेज मिनिस्टरी समझते थे, लेकिन इस साल ई ह्यूमिलिएशन रिसोर्सेज मिनिस्टरी बन गया। ऐसन मिनिस्टरी, जो पढ़ाई में मेहनत करने के बदले किसी खास जातियों में पैदा होने को बेसी महत्व देता है। गरीब बचवा सब को पढ़ने के लिए टाट-पट्टी नहीं मिल रहा, इसकी चिंता अर्जुन बाबू ने साल भर नहीं की, लेकिन सम्पन्न लोगों को भी वोट की खातिर आरक्षण मिलना चाहिए, इसकी चिंता उनको बहुते रही।

ऐसने हाल रहा स्वास्थ्य मंतरी रामदास का। हमरे समझ में ई नहीं आया कि उनको स्वास्थ्य मंतरी की कुर्सी प्यारी है या एम्स के निदेशक की! हैं तो ऊ देश के स्वास्थ्य मंतरी, लेकिन साल भर एम्स के सर्वेसर्वा बनने के लिए लड़ते रहे। अब हमरे समझ में ई नहीं आया कि लोग अपना परमोशन चाहते हैं, लेकिन रामदास अपना डिमोशन काहे चाह रहे हैं? अगर एम्स से एतना ही परेम है औरो वेणुगोपाल एतना ही अयोग्य हैं, तो आप उनके साथ पोस्ट काहे नहीं बदल लेते? उन्होंने देश की आपसे बेसी सेवा की है औरो अयोग्य भी ऊ आपसे बेसी हैं, इसलिए ऊ बढि़या मंतरी साबित होंगे, इसकी पूरी गारंटी है!

वैसे, हमरे खयाल से ऐसन डिमोशन सत्ता के फेर में ही होता है। काहे कि अपना कुछ ऐसने डिमोशन इस साल लाल झंडे वालों ने भी किया। ई कहना मुश्किल रहा कि विचारधारा उनके लिए बेसी अहमियत रखती है या सत्ता। का है कि सीपीआई का मतलब भले ही 'कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया' होता हो, लेकिन सिंगुर जैसन तमाम काम करने के बाद उसका नाम अगर 'कोलेबोरेशन आफ पराइवेट इंडस्ट्री' रख दिया जाए, तो कौनो गलत नहीं होगा! तो ऐसने कनफूजन में बीत गया हमरा साल, कहीं आपके साथ भी तो ऐसने नहीं रहा?

6 comments:

जगदीश भाटिया said...

हमेशा की तरह बहुतै मजेदार। :D

Jitendra Chaudhary said...

बहुत तै ही सही कहे हो, बिहारी बाबू।
ई साला राजनीति ही बहुत #$@*&(! चीज है, आदमी को का से का बनाय देत है।

Ashish said...

Jha Saheb,

Bahuk khoob likhen hain aap.

Regards,

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह-झक्कास!!

priyankar said...

यह उत्तर-आधुनिक समय है . सब पहचान गड्ड-मड्ड हैं . कई चिड़िया हैं और उनकी कई जोड़ा आंखें . निशाना साधे तो कहां . आज का अर्जुन दिग्भ्रमित है .

इदन्नम्म said...

दूसरों की छोडो, यहाँ तो अपनी ही पहचान नही रही। समझ नही आता कया थे और कया हो गये।