Friday, December 29, 2006

राजनीति की बिसात

इस साल राजनीति की बिसात पर काफी कुछ हुआ। इनमें से कुछ देश के लिए बेहतर रहे, तो कुछ बदतर। कुछ ने देश व समाज को जोड़ा, तो कुछ ने तोड़ा। कुछ पार्टियों और नेताओं ने अपनी ताकत बढ़ाई, तो कुछ की घट गई। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव, आरक्षण की बात, वंदेमातरम् पर विवाद और अफजल गुरु के फांसी पर दांवपेंच जैसी कई चीजें इस साल की खास बात रही। एक जायजा साल भर के राजनीतिक परिदृश्य का:

शहीद वोट से बड़ा नहीं

ऐसा कभी पहले सुना नहीं गया। इससे पहले शायद ही किसी आतंकवादी को लेकर नेताओं में इतनी व्यापक 'सहानुभूति' रही हो, जो इस साल दिखी। जब कोर्ट ने संसद पर हमले के आरोपी आतंकी अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाई, तो उस फैसले पर अमल रोकने की पैरवी जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद से लेकर कई केंद्रीय मंत्री तक ने की। संसद पर हुए हमले में शहीद हुए जांबाजों के परिजनों ने शौर्य पदक तक लौटा दिए, लेकिन सरकार जैसे सब कुछ 'भूल' चुकी है।

वोट के डर से...

आजादी के बाद के छह दशकों में राष्ट्रीयता की भावना कभी इतनी शर्म की चीज नहीं बनी। जिस राष्ट्रीय गीत 'वंदेमातरम्' को गा-गाकर हजारों लोग देश के नाम पर शहीद हो गए और जिसने करोड़ों लोगों के दिलों में देश को आजादी दिलाने का जोश भरा, उसी वंदेमातरम् को इस साल घोर साम्प्रदायिक गीत घोषित कर दिया गया। वोट का जोर कितना बड़ा होता है कि इस विवाद के बाद बड़े-बड़े नेताओं में भी देश की वंदना का जोश पैदा नहीं हो पाया और उनमें वंदेमातरम् गाने का साहस नहीं पैदा हो सका।

वोट की खातिर

मई में अर्जुन सिंह ने बिना अपने कैप्टन से पूछे ही बडे़ संस्थानों में ओबीसी कैटेगरी को आरक्षण देने का ऐलान कर दिया। इस मामले पर खूब राजनीति हुई। शिक्षा को सुधारने में असफल रहे अर्जुन सिंह ने समाज को जबर्दस्ती आरक्षण का झुनझुना पकड़ाया। यह सुविधा किसी ने मांगी नहीं थी। मंडल के दिन फिर से याद आ गए। समाज को बांटने वाली इस एक घोषणा से एक बार फिर छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया। अंतत: सुप्रीम कोर्ट के आश्वासन से आंदोलन तो खत्म हो गया, लेकिन समस्या के बेहतर समाधान के लिए गठित मोइली कमिटी कुछ खास नहीं कर पाई। वोट के चक्कर में आरक्षण का विरोध तो किसी ने नहीं किया, लेकिन उसके स्वरूप को बदलने की सलाह बीजेपी और लेफ्ट की कुछ पार्टियों ने जरूर दी।

विधानसभा चुनाव

देश में हुए पांच विधानसभा चुनावों को देश की राजनीति को दिशा देने वाला माना गया। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की हार हुई, तो पश्चिम बंगाल में वाम गठबंधन की जीत। पांडिचेरी और असम में सत्ता कांग्रेस के हाथ रही। तमिलनाडु में डीएमके नीत डीपीए जीता और करुणानिधि फिर से एक बार मुख्यमंत्री बने। पश्चिम बंगाल में वाम गठबंधन ने 294 में 232 सीटें जीतकर तमाम गणित को पलट दिया, तो केरल में भी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने फिर से सत्ता हथिया ली।

कोर्ट का झटका

कोर्ट ने सरकार को इस साल खूब झटके दिए। अगस्त में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार से हज के लिए सब्सिडी बंद करने को कहा, तो सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रियों पर मुकदमा चलाने के लिए सक्षम अधिकारी से अनुमति लेने संबंधी बाध्यता खत्म कर दी। यानी अब बेईमान मंत्रियों का कवच खत्म हो गया और उनकी 'जेल यात्रा' आसान हुई।

दागी नेता, सब में होता

साल भर दागी सांसदों व विधायकों का मामला छाया रहा। अपने सेक्रेटरी की हत्या के जुर्म में कोयला मंत्री शिबू सोरेन को आजीवन कारावास मिला। नवजोत सिंह सिद्धू को एक पुराने मामले में सजा मिली। जेल से छूटे जयप्रकाश नारायण यादव को केंद्र में मंत्री पद मिला, तो मुलायम सिंह ने भी बाहुबली राजा भैया को जेल से छूटते ही फिर से मंत्री बना दिया। लगातार कानून को ठेंगा दिखाते सांसद सैयद शहाबुद्दीन अंतत: सलाखों के अंदर पहुंचे। जॉर्ज फर्नांडीज व जया जेटली के खिलाफ रक्षा खरीद मामले में सीबीआई ने आरोप पत्र दायर किए।

फिर से 'गरीबी हटाओ'

कांग्रेस को एक बार फिर गरीबों की याद आई। इस साल गठबंधन सरकार ने इंदिरा गांधी के प्रसिद्ध 'गरीबी हटाओ' के नारे को फिर से स्वर देने की प्लानिंग की, लेकिन जमीन पर कुछ भी दिख नहीं रहा।

बिगड़ैल छात्र राजनीति

छात्र राजनीति को दिशा देने के लिए लिंग्दोह कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की, लेकिन कोई उसकी सिफारिश मानने को तैयार नहीं। छात्र राजनीति की सबसे दुखद घटना यह रही कि मध्य प्रदेश के उज्जैन में छात्र नेताओं ने माधव कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. हरभजन सिंह सभरवाल की पीट-पीटकर हत्या कर दी। यूपी में छात्र नेताओं को सरकार से गनर मिलने पर लखनऊ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर ने आपत्ति जताई और यूनिवर्सिटी को कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया।

बेआबरू होकर...

कभी गांधी परिवार के बेहद निकट रहे कुंवर नटवर सिंह इस साल उससे बेहद दूर रहे, जाहिर है कांग्रेस से भी वह दूर हो गए। तेल के खेल में उन्हें इस साल पार्टी से निलंबित कर दिया गया और कुंवर साहब ने भी कांग्रेस की ऐसी-तैसी कर देने की गर्जना की, लेकिन किया कुछ नहीं। फिलहाल बेरोजगारी में दिन कट रहे हैं।

सीडी की अमर कहानी

अमर सिंह ने अपने फोन टैपिंग और उसकी बनीं सीडीज को लेकर खूब बवाल मचाया। सीडीज में क्या था, यह तो बहुत कम लोगों को पता चला, लेकिन अमर सिंह ने इस बहाने अपने विरोधियों की खूब फजीहत की। सुर्खियों में महीने भर छाए रहे।

राजनैतिक किताबों पर बवाल

वी पी सिंह पर लिखी किताब 'मंजिल से ज्यादा सफर' किताब खूब विवादों में रही, तो 'अ कॉल टू ऑनर: इन सर्विस ऑफ इमर्जेंट इंडिया' लिखकर जसवंत सिंह ने बड़ा बखेड़ा खड़ा किया। पीएमओ में भेदिया होने का रहस्योद्घाटन करने वाली यह किताब खूब बिकी। कंधार विमान अपहरण कांड की 'हकीकत' बयान करने का दावा करने वाली यह किताब बीजेपी के लिए 'आ बैल मुझे मार' को चरितार्थ करती नजर आई।

तख्ता पलट

छोटे राज्यों में अंकों का गणित कितना खतरनाक होता है, इसका उदाहरण इस साल खूब दिखा। कर्नाटक में साल की शुरुआत में ही पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा के बेटे एच डी कुमारस्वामी ने कांगेसी मुख्यमंत्री धरम सिंह का तख्ता पलट दिया।

झारखंड में भी ऐसा ही हुआ। निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को कांग्रेस, राजद व झामुमो जैसी पार्टियों ने मुख्यमंत्री बना दिया और इस तरह सालों से जमी अर्जुन मुंडा सरकार का तख्ता पलट गया।

पार्टियों का यह साल

बीजेपी: सत्ता का स्वाद एक बार चख लेने के बाद कोई भी पार्टी कितनी खोखली हो जाती है, बीजेपी इसका उदाहरण है। पूरे साल पार्टी में उठा-पटक चलती रही और कैडर आधारित पार्टी का पोल खोलती रही। उमा भारती और मदनलाल खुराना के बागी रवैये से परेशान पार्टी आलाकमान ने दोनों को सलाम-नमस्ते कहना ही उचित समझा। अप्रैल में झारखंड के वरिष्ठ बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने भी पार्टी छोड़ दी। कद्दावर नेता प्रमोद महाजन की मौत से भी पार्टी की धार कुंद हुई। उपचुनावों और यूपी के स्थानीय निकायों के चुनाव में कुछ सफलता मिली, लेकिन बाकी जगह प्रदर्शन बुरा रहा। कर्नाटक में जेडी एस की सत्ता को सहारा दिया।

कांग्रेस: अपने सामंती रवैये को लेकर बदनाम रही कांग्रेस ने इस साल घर के बुजुर्ग की भूमिका बखूबी निभाई और गठबंधन धर्म को शिद्दत से समझा। वामपंथियों की घुड़की से बिना भड़के पार्टी ने अपने 'भानुमति के कुनबे' के साथ सत्ता का एक और साल पार कर लिया। केरल में सत्ता जाने के बावजूद पांडिचेरी और असम में सत्ता मिली। झारखंड में उसने बीजेपी की सत्ता गायब की।

लेफ्ट फ्रंट: वामपंथी इस बार ज्यादा ईमानदार नजर आए। जो किया, खुलकर किया, भले ही उन्हें अपनी विचारधारा को तिलांजलि देनी पड़ी। अमेरिका, विदेशी निवेश, तेल का दाम, लेबर लॉ जैसे तमाम मुद्दों पर विरोध तो किया, लेकिन वाम पार्टियां जिद पर नहीं अड़ीं। सिंगुर जैसी घटना के बाद तो लोगों ने बीजेपी से भी ज्यादा बड़ी 'पूंजीपतियों की पार्टी' कहा। तमाम आशंकाओं के बावजूद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जोरदार जीत दर्ज की, तो केरल में सत्ता उसके पास आई।

जो चले गए

प्रमोद महाजन: बीजेपी के इस 'लक्ष्मण' को उनके सगे लक्ष्मण ने अपने उत्कर्ष का आनंद नहीं लेने दिया। 22 अप्रैल को उनको उनके छोटे भाई ने गोली मार दी और बारहवें दिन मौत से संघर्ष करते हुए भारतीय राजनीतिक बिसात के सबसे माहिर खिलाड़ी ने सबको अलविदा कह दिया।

कांशी राम: वर्षों से बीमार चल रहे दलितों के इस सबसे बड़े पैरोकार ने इस साल अंतिम सांस ले ली। अपनी उपस्थिति से भारतीय राजनीति और सामाजिक ढांचे को संतुलित करने वाले बसपा के इस नेता की कमी लोगों को वर्षों तक खलेगी।

इधर उधर की

नेता के पास इतना पैसा: सीबीआई का कहना था कि उसने चौटाला परिवार के 1467 करोड़ रुपये की संपत्ति का पता लगाया है। सीबीआई के छापे के दौरान तो चौटाला परिवार के दो फार्म हाउसों से 13 लाख रुपये नकद बरामद हुए।

नेता को हेलिकॉप्टर: अब तक नेताओं को सिक्कों से तौलने और सोने का ताज पहनाने की ही खबरें आती थीं, लेकिन हाल ही में कुछ अद्भुत हुआ। गुर्जर समाज ने अपने नेता सांसद अवतार सिंह भड़ाना को एक-एक रुपया चंदा कर हेलिकॉप्टर खरीदकर दिया। उम्मीद यह कि नेताजी हवाई दौरा कर तेजी से उनके हितों की पैरवी करेंगे।

बुरी विदाई: बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह को कोर्ट के एक फैसले ने गद्दी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। कोर्ट ने सरकार नहीं बनने देने के लिए उनके विरुद्ध टिप्पणी की। एक बार फिर साबित हुआ- कोर्ट है, तो देश में कानून है।

3 comments:

Udan Tashtari said...

पूरे साल का लेखा जोखा बडे ही सुंदर ढ़ंग से पेश करने के लिये बधाई.

इस तरह के मासिक स्तंभ की दरकार है.

शशि सिंह said...

इस लेख में ब्लॉगर नहीं एकदम पत्रकार लग रहे हो आप. अच्छा विश्लेषण रहा.

संजय बेंगाणी said...

प्रसंशनिय लेख. एकदम कसाव लिए.