Thursday, April 12, 2007

न्याय पर एतना गुस्सा!

उस दिन नेताजी बहुते गुस्सा में थे। लगा उनका बस चलता, तो देश से सब ठो कोर्ट-कचहरी को उखाड़ फेंकते। बोलने लगे, 'आखिर हर चीज की एक लिमिट होती है, लेकिन ई कोर्ट है कि दिनों दिन बेकाबुए होता जा रहा है। बताइए, कभियो आरक्षण में अड़ंगा लगा देता है, तो कभियो अल्पसंख्यक की परिभाषे बदल देता है। अरे भाई, आपको जो काम दिया गया है, ऊ न कीजिए, खामखा सामाजिक न्याय में टांग काहे अड़ाते हैं... आप चोरी चकारी का मामला देखिए, मियां-बीवी का झगड़ा सुलटाइए, पॉकेटमारों को सजा दीजिए..., झूठ्ठे सरकारी फैसलों में न्याय खोजते रहते हैं! न्याय किस चिडि़या का नाम है, ई हम नेता लोग से ज्यादा आप नहीं जान सकते! अपनी औकात समझिए औरो हमरी औकात पर सवालिया निशान मत लगाइए!

एतना कहते कहते नेताजी का हलक सूखने लगा। हमने उन्हें बढ़िया कंपनी का कोला पिलाया, तब जाकर ऊ तनिक ठंडा हुए, लेकिन तुरंते फिर गरमा गए, 'ई कोर्ट ने जीना हराम कर दिया है। माना कि हम सिंगुर औरो नंदीग्राम में बाजार से हार गया हूं, लेकिन कोर्ट से थोड़े हार सकता हूं। हम ईंट से ईंट बजा दूंगा।'

ईंट की बात सुनकर हमने नेताजी को रोका, 'लेकिन आपने गरीबों को जिस तरह से बाजार के भरोसे छोड़ दिया है, उससे तो आपको बजाने के लिए ईंट भी नहीं मिलेगी। ईंट भट्ठे पर गरीब मर रहे हैं, लेकिन आप तो कुछो नहीं करते?'

नेताजी तनिक नरमाए, 'ई किसने कहा कि हम गरीबों के लिए कुछ नहीं करते? बस बिजनेसमैनों को हम परेशान नहीं करना चाहता हूं, काहे कि ऊ देश में कारखाना लगा रहे हैं, सेज बना रहे हैं, लेकिन मजदूरों की मदद के लिए हमरे पास अभियो बहुत हथियार है। हम मजदूरों की दिहाड़ी भले नहीं बढ़वा सकता हूं, लेकिन हम ईंट भट्ठा पर जाऊंगा औरो बहुसंख्यकों की दिहाड़ी से एक रुपया कटवाकर अल्पसंख्यकों को दिलवाऊंगा। अल्पसंख्यक का स्टेटस उससे कोयो नहीं छीन सकता। ऐसने हम वहां ओबीसी के लिए साढे़ 27 परतिशत आरक्षणो लागू करवाऊंगा।'

हमने कहा, 'लेकिन जिन मजदूरों से आप एक रुपया काटेंगे, उनमें तो ओबीसी भी होंगे?'
नेताजी फिर संभले, 'हां, होंगे, लेकिन हमरे लिए अल्पसंख्यकों की बेहतरी औरो अगड़ों को आसमान से नीचे उतारना पहली चिंता है। अगड़ों ने सदियों से मलाई खाई है औरो अब उन्हें दूसरे को मलाई खाने देना चाहिए। हमारा सिद्धांत 'जैसे को तैसा' वाला है। अगड़ों ने पहले पिछड़ों को दबाया, अब अगड़ों को दबाओ...।'

हमने उन्हें रोका, 'फिर तो अल्पसंख्यक से भी आपको 'जैसे का तैसा' वाला बर्ताव करना चाहिए। उन्होंने भी आज के बहुसंख्यक को सदियों तक दबाया है। वो आपने तो सुना होगा- जजिया कर...।'
नेताजी ने हमको इससे आगे एको ठो शब्द नहीं बोलने दिया। बोले, 'काहे साम्प्रदायिकता वाली बात करते हो। जो बात सदियों पुरानी है, उस पर बहस कैसा? गड़े मुर्दे काहे उखाड़ना, इससे साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ता है...।'

अब हमने नेताजी को रोका, 'फिर तो आपको भी कोर्ट की बात मान लेनी चाहिए कि जातिगत आरक्षण से समाज बंटेगा। पुरखों की गलती की सजा अगर आप एक को नहीं देना चाहते, तो दूसरे को काहे देना चाहते हैं...?'

हमरी बात सुनकर नेताजी का हाजमा बिगड़ गया। ऊ अभियो शौचालय में हैं औरो शायद अपने को सही साबित करने वाला तर्क खोज रहे हैं। कोर्ट को अब ऊ बाद में देखेंगे। चलिए इंतजार करते हैं!

6 comments:

अतुल शर्मा said...

बहुत ही अच्छा लिखे हो भैया। ई बात तनिक ब्लॉगवा के नेतन को भी समझाए दो बड़ा भला होगा।

Raag said...

इ तो भिगा के जूता मारे हो नेता लोगन के।

Tarun said...

नेता लोगन को खूब पटखनी दिये हो

अरुण said...

भैये एसा मत कहो काहे ये मोहल्ले और कसबे वालो को छेड्ते हो अब देखो हम ने बस यही पूछा क्या हम गलत थे कोई नही आया बताने तो भैया ये तो पढे लिखे लोग है शाम को दो घूट पिकर चार गाली दे कर खुश हा कही मै कोइ बे मतलब की फ़ूहड सी कुछ लिख मारता तो टिप्पणी कर ने सारे आते

Udan Tashtari said...

गजब, महाराज, गजब!! दिये रहो!!!

Shrish said...

वाह-वाह! बिहारी बाबू आपके लिखने की शैली लाजवाब है, कम शब्दों में सटीक और प्रभावी बात।

हमने उन्हें रोका, 'फिर तो अल्पसंख्यक से भी आपको 'जैसे का तैसा' वाला बर्ताव करना चाहिए। उन्होंने भी आज के बहुसंख्यक को सदियों तक दबाया है। वो आपने तो सुना होगा- जजिया कर...।'
नेताजी ने हमको इससे आगे एको ठो शब्द नहीं बोलने दिया। बोले, 'काहे साम्प्रदायिकता वाली बात करते हो। जो बात सदियों पुरानी है, उस पर बहस कैसा? गड़े मुर्दे काहे उखाड़ना, इससे साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ता है...।'


बहुत खूब इसका इन नेता लोगों के पास कोई जवाब नहीं।