Thursday, May 03, 2007

किरकेट के नाम पर दे दे बाबा

ई किरकेटिया खिलाडि़यो सब न अजीब हैं। विश्व कप से पहिले किरकेट छोड़कर ऊ विज्ञापनों में बिजी रहते थे औरो विश्व कप से बाहर हुए, तो बीसीसीआई से कुश्ती लड़ने में बिजी हो गए हैं। मतलब सब कुछ करेंगे, बस किरकेट नहीं खेलेंगे!

लेकिन उनका ई किरकेट न खेलना अब उन्हीं के लिए समस्या बन गई है। खिलाडि़यों को लाइन पर लाने के लिए किरकेट बोर्ड ने उन्हें तीन से बेसी शैंपू-सर्फ बेचने से रोक दिया है। इससे अब ऊ रो रहे हैं। दिक्कत ई है कि विज्ञापन नहीं करेंगे, तो पैसा कहां से आएगा औरो जब पैसे नहीं आएगा, तो उनके सपनों के उन महलों का क्या होगा, जिनकी नींव विज्ञापनों के भरोसे ही पड़ी है! अब महेंद सिंह धोनी को लीजिए। बेचारे ने इन्हीं विज्ञापनों के बूते लंबे-चौड़े स्विमिंग पूल वाले फाइव स्टार घर का सपना देखा था। निरमाण कार्य शुरुओ हो गया था, लेकिन अब पूरा होना मुश्किल है!

मिडिल क्लास फैमिली के धोनी किरकेटर नहीं होते, तो बुढ़ापे में मुश्किल से एक ठो घर खरीद पाते, लेकिन किरकेट में ऐसन चमके सपने भी करोड़ों का देखने लगे। लेकिन इस मुए विश्व कप ने सब चकनाचूर कर दिया। अब कैसे उनका फाइवस्टार घर बनेगा औरो कैसे स्विमिंग पूल, जिसमें ऊ तैरने का सपना देखा करते थे। चलिए अभी तक की कमाई से अगर ऊ स्विमिंग पूल बनाइयो लेंगे, तो उसमें डालने के लिए रांची जैसन शहर में साढे छह लाख गैलन महंगा पानी कहां से लाएंगे?

वैसे, विज्ञापन की कमाई पर धोनिए नहीं औरो बहुतों के सपने जुड़े हुए हैं। युवराज के पास पैसा नहीं होगा, तो हसीना किम शर्मा उनके पीछे क्यों भागेगी? पैसा नहीं होगा, तो सहवाग के रेस्टोरेंट की चेन कैसे खुलेगी? पैसा नहीं होगा, तो धार्मिक स्थल की शरण में पड़े पठान का अपना घर कैसे बनेगा? पैसा नहीं होगा, तो सचिन की फरारी का का होगा?

किरकेट को धरम और किरकेटरों को भगवान मानने वाले हमरे एक मित्र का कहना है कि इनके सपनों को पूरा करने के लिए हमको-आपको आगे आना चाहिए। आखिर जब उन भगवानों ने सपनों की नींव रख दी है, तो निकम्मा होने के बावजूद इनकी मदद करना हम 'भक्तों' का फर्ज बनता है।

तो आइए, राष्ट्रीय आपदा कोष की तरह एक ठो किरकेटर आपदा कोष बनाते हैं औरो उसमें दान देते हैं, ताकि किरकेटरों के उन सपनों को पूरा किया जा सके, जिसकी नींव रखी जा चुकी है। क्या हुआ जो इन्होंने हमारे-आपके सपने तोड़ दिए, हम तो उदार दिल के हैं! वैसे भी, यह किरकेट के हित में ही होगा, काहे कि अगर इन किरकेटरों का सपना चकनाचूर हो गया, तो अगली पीढियां किरकेट खेलने से उसी तरह दूर भागेगी, जैसे आज लोग हॉकी औरो एथलेटिक्स से दूर भागते हैं। आखिरकार, किरकेटरों की फाइव स्टार लाइफ के ग्लैमर ने ही तो बच्चों के हाथों से गिल्ली-डंडा छीनकर बल्ला-गेंद पकड़ाया है!

1 comment:

Udan Tashtari said...

सही है, महाराज. करो कोष की स्थापना, हमऊ कुछ न कुछ दो दे दिहें.