Monday, October 08, 2007

बस ईमानदारों को न दिखे घूस

भरष्टाचार करना जेतना आसान है, उसको छिपाना ओतने मुश्किल। कमबखत कहीं न कहीं से दिखिए जाता है। घूस कमाते वक्त भले ही आप दुनिया को पता नहीं चलने दीजिए, लेकिन जेब में पहुंचते ही ई दुनिया को दिखने लगता है। अब का कीजिएगा, पैसे का गरमी होबे एतना तेज करता है कि बलबलाकर जेब से बाहर आ जाता है औरो पूरी दुनिया जान जाती है कि बंदा घूस कमाकर धन्ना सेठ बन गया है।

वैसे, किसने अपना जेब केतना गरम किया, इसका पता तभिये चलता है, जब कौनो व्यवस्था ताश के पत्ता जैसन भरभरा के गिर जाए। मसलन, जब एम्स के डाक्टरों को डेंगू हो जाए, सरकारी डाक्टर अपना इलाज पराइवेट नर्सिन्ग होम में कराए, परोफेसर का बेटा मैट्रिक फेल हो जाए, नई सड़क में गड्ढा हो जाए... तभिये पता चलता है कि घूस किस-किस ने खाया।

दिक्कत ई है कि घूस खाने वाला व्यवस्था पर ऐसन रंग-टीप करता है कि भरष्टाचार का पोल जल्दी खुलबे नहीं करता। औरो जब तक पोल खुलता है, बंदा या तो आलीशान बाथरूम बना चुका होता है या फिर सारा पैसा खाकर बाथरूम गंदा कर चुका होता है। बाथरूम से याद आया, तनिये दिन पहले जो यूपी के पूर्व मुख्य सचिव गिरफ्तार हुए हैं, उनके बाथरूम में सोने का नलका लगा हुआ है।

अभिये हमरी इस मुख्य सचिव साहेब से मुलाकात हुई, तो घूसखोरों की एक ठो बड़की व्यथा का हमको पता चला। हमने उनसे पूछा कि ऐसना घूस कमैइबे काहे किए कि दुनिया थू-थू कर रही है आप पर? ऊ तनिये ठो शरमाए, लेकिन फिर अपने सरकारी संस्कार पर आ गए। बोले, 'के कहता है कि घूस कमाना गलत है? पूरी दुनिया भरष्टाचार के बूते चल रही है। अगर भरष्टाचार बंद हो जाए, तो जेट की स्पीड से भाग रही आज की दुनिया, कल्हे से रेंगने लगेगी। सच बताऊं, तो भरष्टाचार खराब नहीं है, इसका दिख जाना खराब है। जब तक भरष्टाचार नहीं दिखता, कौनो सीबीआई पकड़ने नहीं आता किसी को, न ही पब्लिक हल्ला करती है, कमबखत भरष्टाचार का दिख जाना ही सब गड़बड़ कर देता है।'

हमने पूछा, 'तो आप ई चाहते हैं कि जैसे घूस नहीं दिखता है, वैसने उससे खरीदी हुई चीजो किसी को नजर नहीं आए! घूसखोर घूस के पैसे से बंगला खरीदे, किसी को नजरे नहीं आए..., ऊ बड़ी-सी लिमोजिन खरीदे, लेकिन किसी को दिखाइए नहीं पड़े..., बीवी के देह पर चालीस किलो सोना लदा है, किसी को दिखाइए नहीं पड़ रहा है... बेटा इंग्लैंड में पढ़ रहा है, पड़ोसी तक को पते नहीं है... घर में लाखों-करोड़ों का समान अंटा पड़ा है, लोगों को दिखबे नहीं कर रहा है... घूसखोर ने बड़का फार्म हाउस खरीदा, किसी को नजरे नहीं आया...।'

बात खतम होती, इससे पहले ही सचिव महोदय ने हमको रोक लिया। बोले, 'आप भी न गजबे वाला बात करते हैं। अरे, जब घूस से खरीदा सामान, कार या घर दिखबे नहीं करेगा, तो लोग का पागल हुआ है कि घूस लेगा? लोग तो घुसहा इसलिए बनते हैं, ताकि जिंदगी मौज से कटे, उसकी रईसी देखकर पड़ोसियों औरो संबंधियों का दिल जले! अगर अय्याशी औरो समृद्धि दिखबे नहीं करेगा, तो लोग घूस कमैइबे काहे करेगा? हम तो बस ई चाहता हूं कि घूस सबको दिखे, हो बस एतना कि घूस उनको न दिखे, जो सरकारी नौकरी में ईमानदारी की कसम खा लेते हैं औरो घूसखोरों को पकड़ने उसके घर चले आते हैं!'

1 comment:

राजीव said...

बड़ी गज़ब की दार्शनिकता भी है अंतिम अनुच्छेद में।


यह भी बड़ी दूरदर्शिता वाले और देश का सुन्दर भविष्य और अर्थशास्त्री हा सोच सकते हैं, कौनो मामूली पब्लिक नहीँ। जरा अंदाज़ लगाईये कि इस प्रक्रिया से पड़ोसी भी प्रेरणा ले सकता है, वह भी घूस लेने की सोचता है, उसे पूरी करता है, वह भी और ऐशो आराम, विलासिता आदि के साधन जुटाता है, फिर उसका भी पड़ोसी... तो इस प्रक्रिया से कितना वाणिज्य व्यापार, उद्योग फलता है और अंततोगत्वा देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में ऐसे लोगों का सकारात्मक सहयोग होता है!